उत्तम मार्दव धर्म:आत्मविनय
उत्तम मार्दव धर्म : 'मैं' से मुक्ति जै न दर्शन में उत्तम मार्दव धर्म दशलक्षण धर्म का दूसरा लक्षण है। ‘मार्दव’ शब्द का मूल अर्थ है— मृदुता, कोमलता और विनम्रता का भाव । जैन आगम परंपरा में इसे विशेष रूप से मान अथवा अहंकार के परित्याग से जोड़ा गया है। अर्थात् जहाँ व्यक्ति जाति, कुल, बल, रूप, विद्या, तप, धन और ऐश्वर्य आदि के कारण उत्पन्न अभिमान को छोड़कर अपने वास्तविक आत्मस्वरूप की ओर उन्मुख होता है, वहीं मार्दव धर्म का उदय होता है। मार्दव का वास्तविक अर्थ मार्दव केवल नम्रतापूर्वक बोलने या दूसरों के सामने झुक जाने का नाम नहीं है। इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ है— ‘मैं श्रेष्ठ हूँ’ इस अहंभाव का क्षय करना। जैन दर्शन के अनुसार मान-कषाय व्यक्ति को अपने बाहरी साधनों और उपलब्धियों के साथ इस प्रकार जोड़ देती है कि वह अपनी आत्मिक पहचान को भूल जाता है। इसके विपरीत मार्दव व्यक्ति को यह समझाता है कि जाति, कुल, धन, पद, शक्ति, सौंदर्य अथवा विद्या सभी परिवर्तनशील हैं; वास्तविक श्रेष्ठता आत्मा के ज्ञान, दर्शन और चारित्र जैसे गुणों में है। इसीलिए कहा गया है— “मृदु का भाव मार्दव है, यह मार्द...