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उत्तम मार्दव धर्म:आत्मविनय

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  उत्तम मार्दव धर्म : 'मैं' से मुक्ति जै न दर्शन में उत्तम मार्दव धर्म दशलक्षण धर्म का दूसरा लक्षण है। ‘मार्दव’ शब्द का मूल अर्थ है— मृदुता, कोमलता और विनम्रता का भाव । जैन आगम परंपरा में इसे विशेष रूप से मान अथवा अहंकार के परित्याग से जोड़ा गया है। अर्थात् जहाँ व्यक्ति जाति, कुल, बल, रूप, विद्या, तप, धन और ऐश्वर्य आदि के कारण उत्पन्न अभिमान को छोड़कर अपने वास्तविक आत्मस्वरूप की ओर उन्मुख होता है, वहीं मार्दव धर्म का उदय होता है। मार्दव का वास्तविक अर्थ मार्दव केवल नम्रतापूर्वक बोलने या दूसरों के सामने झुक जाने का नाम नहीं है। इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ है— ‘मैं श्रेष्ठ हूँ’ इस अहंभाव का क्षय करना। जैन दर्शन के अनुसार मान-कषाय व्यक्ति को अपने बाहरी साधनों और उपलब्धियों के साथ इस प्रकार जोड़ देती है कि वह अपनी आत्मिक पहचान को भूल जाता है। इसके विपरीत मार्दव व्यक्ति को यह समझाता है कि जाति, कुल, धन, पद, शक्ति, सौंदर्य अथवा विद्या सभी परिवर्तनशील हैं; वास्तविक श्रेष्ठता आत्मा के ज्ञान, दर्शन और चारित्र जैसे गुणों में है। इसीलिए कहा गया है— “मृदु का भाव मार्दव है, यह मार्द...

जैन दर्शन: चुनौतियाँ और तार्किक समाधान

  समकालीन समस्याओं के समाधान में जैन चिंतन की तार्किक प्रासंगिकता व र्तमान युग विज्ञान, तकनीक और आर्थिक विकास की दृष्टि से अत्यंत उन्नत है, किंतु इसके साथ हिंसा, पर्यावरण-संकट, उपभोक्तावाद, मानसिक तनाव, असहिष्णुता, सामाजिक संघर्ष और संसाधनों के असमान वितरण जैसी चुनौतियाँ भी बढ़ रही हैं। ऐसे समय में जैन दर्शन के अहिंसा, अनेकांतवाद, अपरिग्रह, स्याद्वाद, आत्मानुशासन, संयम और समता जैसे सिद्धांत केवल धार्मिक आस्था के विषय न रहकर आधुनिक जीवन की समस्याओं के तार्किक समाधान के महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं। जैन दर्शन केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक तर्कसंगत, वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक पद्धति है। आज का युग जलवायु संकट, मानसिक तनाव, अंधाधुंध उपभोक्तावाद, सामाजिक ध्रुवीकरण और वैचारिक असहिष्णुता जैसी विकट समस्याओं से जूझ रहा है। जैन चिंतन के मूलभूत स्तंभ इन आधुनिक संकटों का व्यावहारिक और तार्किक समाधान प्रस्तुत करते हैं।  1. हिंसा और संघर्ष : अहिंसा जैन दर्शन में अहिंसा केवल शारीरिक हिंसा से बचने तक सीमित नहीं है, बल्कि मन, वचन और कर्म से किसी भी जीव को पीड़ा न पहुँचाने ...

श्री मुजफ्फर हुसैन द्वारा जैन दर्शन की समकालीन प्रासंगिकता:तथ्यात्मक लेख

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  : तथ्यात्मक लेख  : ​ समकालीन वैश्विक संकट , बहुलवाद और जैन दर्शन ( श्री मुजफ्फर हुसैन के  मूल  आलेख का समीक्षात्मक एवं तुलनात्मक मूल्यांकन ) *डॉ मुकेश जैन , सेवानिवृत्त प्राध्यापक , भोपाल !   प्रस्तुत लेख प्रसिद्ध स्तंभकार और विचारक पद्मश्री मुजफ्फर हुसैन द्वारा जैन दर्शन की समकालीन प्रासंगिकता पर लिखे गए विचारों के संकलन का इस आलेख में प्रस्तुत दार्शनिक अवधारणाओं, ऐतिहासिक दावों, पर्यावरण-वैज्ञानिक तर्कों और उद्धरणों का गंभीर व निष्पक्ष अकादमिक परीक्षण करते हुए एक विस्तृत तथ्यात्मक लेख तैयार किया गया है। विषय - क्षेत्र : तुलनात्मक धर्मशास्त्र , व्यावहारिक नीतिशास्त्र (Applied Ethics), और वैश्विक इतिहास ​ १ . प्रस्तावना एवं पृष्ठभूमि ​ २१वीं सदी में मानव सभ्यता अभूतपूर्व संकटों के दौर से गुजर रही है । जलवायु परिवर्तन , जल - संकट , भू - राजनीतिक संघर्ष , धार्मिक असहिष्णुता और अनियंत्रित उपभोगवाद ने वैश्विक व्यवस्था के सम्मुख गंभीर अस्तित्ववादी प्रश्न खड़े किए हैं ।  मनुष्य के कष्टों का न...