उत्तम मार्दव धर्म:आत्मविनय

 

उत्तम मार्दव धर्म : 'मैं' से मुक्ति

जैन दर्शन में उत्तम मार्दव धर्म दशलक्षण धर्म का दूसरा लक्षण है। ‘मार्दव’ शब्द का मूल अर्थ है—मृदुता, कोमलता और विनम्रता का भाव। जैन आगम परंपरा में इसे विशेष रूप से मान अथवा अहंकार के परित्याग से जोड़ा गया है। अर्थात् जहाँ व्यक्ति जाति, कुल, बल, रूप, विद्या, तप, धन और ऐश्वर्य आदि के कारण उत्पन्न अभिमान को छोड़कर अपने वास्तविक आत्मस्वरूप की ओर उन्मुख होता है, वहीं मार्दव धर्म का उदय होता है।

मार्दव का वास्तविक अर्थ

मार्दव केवल नम्रतापूर्वक बोलने या दूसरों के सामने झुक जाने का नाम नहीं है। इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ है—‘मैं श्रेष्ठ हूँ’ इस अहंभाव का क्षय करना। जैन दर्शन के अनुसार मान-कषाय व्यक्ति को अपने बाहरी साधनों और उपलब्धियों के साथ इस प्रकार जोड़ देती है कि वह अपनी आत्मिक पहचान को भूल जाता है। इसके विपरीत मार्दव व्यक्ति को यह समझाता है कि जाति, कुल, धन, पद, शक्ति, सौंदर्य अथवा विद्या सभी परिवर्तनशील हैं; वास्तविक श्रेष्ठता आत्मा के ज्ञान, दर्शन और चारित्र जैसे गुणों में है।

इसीलिए कहा गया है—

“मृदु का भाव मार्दव है, यह मार्दव मानशत्रु का मर्दन करने वाला है।”

अर्थात् मार्दव उस ‘मान’ का नाश करता है जो आत्मिक विकास के मार्ग में बाधा बनता है।

आठ प्रकार के मद और उनका त्याग

जैन परंपरा में मुख्यतः आठ प्रकार के मद बताए गए हैं—

  1. जाति का मद — अपनी जाति को श्रेष्ठ मानना
  2. कुल का मद — अपने वंश अथवा परिवार का अभिमान
  3. बल का मद — शारीरिक अथवा सामर्थ्य का अहंकार
  4. रूप का मद — सौंदर्य का अभिमान
  5. तप का मद — अपनी तपस्या को लेकर अहंभाव
  6. विद्या का मद — ज्ञान अथवा शिक्षा का गर्व
  7. धन का मद — संपत्ति और संसाधनों का अभिमान
  8. ऐश्वर्य का मद — पद, प्रतिष्ठा और अधिकार का गर्व

जैन दृष्टि में समस्या इन वस्तुओं के होने में नहीं है; समस्या इनके आधार पर ‘मैं दूसरों से श्रेष्ठ हूँ’ जैसी मानसिकता पैदा होने में है। इसलिए मार्दव इन उपलब्धियों को नकारता नहीं, बल्कि उनसे उत्पन्न अहंकार को छोड़ने की प्रेरणा देता है।

मार्दव और विनय का संबंध

उत्तम मार्दव का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष विनय है। जैन परंपरा में विनय को ज्ञान, दर्शन, चारित्र और उपचार—इन चार रूपों में समझाया गया है। ज्ञानी के प्रति सम्मान, सम्यग्दर्शन के प्रति श्रद्धा, चारित्रवान के प्रति आदर तथा गुरुजनों के प्रति मन-वचन-काय से विनम्रता—ये सभी मार्दव की व्यावहारिक अभिव्यक्तियाँ हैं।

इस प्रकार मार्दव केवल मन की भावना नहीं रहता, बल्कि व्यवहार की संस्कृति बन जाता है। जहाँ मार्दव है, वहाँ दूसरों को छोटा दिखाने की आवश्यकता नहीं रहती और सम्मान प्राप्त करने के लिए अहंकार का प्रदर्शन नहीं करना पड़ता।

मार्दव और आत्मसम्मान में अंतर

मार्दव को कभी-कभी गलत अर्थ में ‘हीनभावना’ या ‘अपने आपको छोटा समझना’ मान लिया जाता है। वास्तव में ऐसा नहीं है।

अहंकार कहता है—
“मैं दूसरों से श्रेष्ठ हूँ।”

हीनभावना कहती है—
“मैं दूसरों से कमतर हूँ।”

जबकि मार्दव कहता है—
“मैं अपने आत्मिक गुणों को पहचानूँ और प्रत्येक जीव में आत्मस्वरूप की समानता को समझूँ।”

इसलिए मार्दव आत्मसम्मान का विरोध नहीं करता; वह अहंकार का परिष्कार करता है। जैन दृष्टि में व्यक्ति को अपने ज्ञान, दर्शन और चारित्र जैसे आत्मिक गुणों का सम्मान करना चाहिए, परंतु उन गुणों को दूसरों के अपमान का आधार नहीं बनाना चाहिए।

आधुनिक जीवन में उत्तम मार्दव की प्रासंगिकता

आज का समाज उपलब्धियों, पद, आर्थिक सामर्थ्य और सामाजिक प्रतिष्ठा को सफलता के प्रमुख मापदंडों से जोड़ता है। ऐसी परिस्थिति में मार्दव धर्म का संदेश और अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है।

परिवार में मार्दव हमें सिखाता है कि उम्र, पद या आर्थिक क्षमता के आधार पर किसी सदस्य को छोटा न समझें।

शिक्षा के क्षेत्र में यह विद्यार्थी और शिक्षक दोनों को ज्ञान के साथ विनय जोड़ने की प्रेरणा देता है। अधिक ज्ञान का अर्थ अधिक अहंकार नहीं, बल्कि अधिक उत्तरदायित्व होना चाहिए।

कार्यस्थल पर पद और अधिकार का उपयोग दूसरों को दबाने के लिए नहीं, बल्कि सहयोग और नेतृत्व के लिए किया जाना चाहिए।

सामाजिक जीवन में जाति, कुल, धन, पद या प्रतिष्ठा के आधार पर श्रेष्ठता का प्रदर्शन सामाजिक दूरी और संघर्ष को जन्म दे सकता है। मार्दव इसके स्थान पर सम्मान, संवाद और सह-अस्तित्व की भावना विकसित करता है।

आध्यात्मिक जीवन में यह सबसे सूक्ष्म परीक्षा है—धर्म करने का भी अहंकार न हो। तप, त्याग, ज्ञान या धार्मिक प्रतिष्ठा भी यदि ‘मैं’ को बड़ा बना दें, तो साधना का उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है।

मार्दव से क्या बदलता है?

मार्दव का अभ्यास व्यक्ति के भीतर कई सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है। स्रोत में इसे मान-कषाय के क्षय, विनय की वृद्धि, परिणामों की विशुद्धि, बैर की निवृत्ति तथा आत्मस्वरूप के चिंतन से जोड़ा गया है।

इसे सरल रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है—

अहंकार कम होता है → विनय बढ़ती है → संबंधों में कटुता घटती है → मन अधिक निर्मल होता है → आत्मचिंतन बढ़ता है।

इसलिए मार्दव केवल व्यक्तिगत सद्गुण नहीं, बल्कि सौहार्दपूर्ण सामाजिक जीवन की आधारभूमि भी बन सकता है।

मार्दव की सबसे बड़ी शिक्षा

मार्दव हमें बाहरी उपलब्धियों से भीतर की उपलब्धि की ओर ले जाता है। धन, पद, रूप, शक्ति और प्रतिष्ठा जीवन में आ सकते हैं और जा सकते हैं; किंतु आत्मा के गुणों की पहचान और उनका विकास व्यक्ति को भीतर से समृद्ध बनाता है।

जैन चिंतन की दृष्टि से प्रश्न यह नहीं है कि “मेरे पास क्या है?”, बल्कि यह है कि “इन उपलब्धियों के बीच मेरे भीतर कितना अहंकार है और कितनी विनय?”

यही प्रश्न उत्तम मार्दव धर्म को केवल पर्व के एक दिन का विषय न बनाकर जीवन-पद्धति बना देता है।

निष्कर्ष

उत्तम मार्दव धर्म हमें झुकना नहीं, बल्कि अहंकार से मुक्त होना सिखाता है; स्वयं को छोटा करना नहीं, बल्कि आत्मा की वास्तविक महानता को पहचानना सिखाता है। जाति, कुल, धन, रूप, विद्या, बल और पद के आधार पर उत्पन्न ‘मैं श्रेष्ठ हूँ’ की भावना से ऊपर उठकर प्रत्येक जीव के प्रति सम्मान रखना ही मार्दव की सार्थकता है।

जैन दर्शन में मार्दव का अंतिम लक्ष्य केवल विनम्र व्यवहार नहीं, बल्कि मान-कषाय से मुक्ति, आत्मगुणों की पहचान और आत्मकल्याण की दिशा में प्रगति है। इसलिए उत्तम मार्दव का संदेश आज भी उतना ही सार्थक है—

“उपलब्धियाँ जीवन की पहचान हो सकती हैं, लेकिन विनय व्यक्तित्व की वास्तविक ऊँचाई है।”

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