श्री मुजफ्फर हुसैन द्वारा जैन दर्शन की समकालीन प्रासंगिकता:तथ्यात्मक लेख

 

: तथ्यात्मक लेख :

समकालीन वैश्विक संकट, बहुलवाद और जैन दर्शन

(श्री मुजफ्फर हुसैन के मूल आलेख का समीक्षात्मक एवं तुलनात्मक मूल्यांकन)

*डॉ मुकेश जैन, सेवानिवृत्त प्राध्यापक, भोपाल !

 

प्रस्तुत लेख प्रसिद्ध स्तंभकार और विचारक पद्मश्री मुजफ्फर हुसैन द्वारा जैन दर्शन की समकालीन प्रासंगिकता पर लिखे गए विचारों के संकलन का इस आलेख में प्रस्तुत दार्शनिक अवधारणाओं, ऐतिहासिक दावों, पर्यावरण-वैज्ञानिक तर्कों और उद्धरणों का गंभीर व निष्पक्ष अकादमिक परीक्षण करते हुए एक विस्तृत तथ्यात्मक लेख तैयार किया गया है।

विषय-क्षेत्र: तुलनात्मक धर्मशास्त्र, व्यावहारिक नीतिशास्त्र (Applied Ethics), और वैश्विक इतिहास

. प्रस्तावना एवं पृष्ठभूमि

२१वीं सदी में मानव सभ्यता अभूतपूर्व संकटों के दौर से गुजर रही है जलवायु परिवर्तन, जल-संकट, भू-राजनीतिक संघर्ष, धार्मिक असहिष्णुता और अनियंत्रित उपभोगवाद ने वैश्विक व्यवस्था के सम्मुख गंभीर अस्तित्ववादी प्रश्न खड़े किए हैं मनुष्य के कष्टों का निवारण अंतर्राष्ट्रीय आधार पर उसका उद्धार केवल अनेकांतमयी जैन दर्शन के माध्यम से ही संभव है। ऐसे समय में मुजफ्फर हुसैन का यह दावा कि २१वीं शताब्दी का धर्म जैन धर्म होगा किसी संप्रदाय विशेष के प्रचार के बजाय एक नैतिक और पारिस्थितिकीय जीवन-शैली (Ethical & Ecological Lifestyle) के रूप में जैन दर्शन की अनिवार्यता को रेखांकित करता है

प्रस्तुत शोध पत्र आलेख में उठाए गए प्रमुख तर्कोंविशेष रूप से त्रिपदी (अहिंसा, अनेकांत, अपरिग्रह), ऐतिहासिक संपर्कों, नारी-स्थिति, तथा पर्यावरण-विज्ञानका परीक्षण करता है

. दार्शनिक आधार: त्रिपदी (Three Pillars of Jain Philosophy)

आलेख में उल्लिखित तीन’ वास्तव में जैन आचारशास्त्र और ज्ञानमीमांसा (Epistemology) की रीढ़ हैं:

  • अहिंसा (Non-violence): जैन अहिंसा केवल शारीरिक हिंसा का अभाव नहीं है, बल्कि 'भाव हिंसा' (मन में दुर्भावना या आसक्ति) से मुक्ति भी है सूक्ष्म जीवों (एकेन्द्रिय से पंचेन्द्रिय तक) के प्रति करुणा का यह सिद्धांत वर्तमान में 'डीप इकोलॉजी' (Deep Ecology) और पशु-अधिकार आंदोलनों का मूल दार्शनिक आधार बन सकता है
  • अनेकांतवाद (Intellectual Pluralism): ज्ञानमीमांसा के स्तर पर अनेकांतवाद और स्याद्वाद यह स्थापित करते हैं कि सत्य बहुआयामी है किसी भी एक दृष्टिकोण को पूर्ण सत्य नहीं माना जा सकता आज की ध्रुवीकृत (Polarized) राजनीति और वैचारिक कट्टरता के समाधान के लिए अनेकांतवाद एक तार्किक संवाद-प्रणाली प्रदान करता है
  • अपरिग्रह (Non-possessiveness / Minimalism): अनियंत्रित पूंजीवाद और प्राकृतिक दोहन का विकल्प अपरिग्रह है यह भौतिक वस्तुओं के प्रति मानसिक अनासक्ति और आवश्यकताओं के स्वेच्छा से परिसीमन की वकालत करता है, जो आधुनिक 'सस्टेनेबल कंजम्पशन' (Sustainable Consumption) का सर्वोच्च रूप है

. ऐतिहासिक एवं अभिलेखीय दावों का वस्तुनिष्ठ परीक्षण

आलेख में कुछ पश्चिमी विद्वानों और ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख है एक अकादमिक शोध पत्र के रूप में इनका साक्ष्य-आधारित विश्लेषण आवश्यक है:

  • सिकंदर और दिगंबर मुनि (कल्यान मुनि / Calanus):
    • ऐतिहासिक तथ्य: ग्रीक स्रोतों (स्ट्रैबो, प्लूटार्क, एरियन) में भारतीय संन्यासियों को 'जिम्नोसोफिस्ट' (Gymnosophists - नग्न ज्ञानी) कहा गया है सिकंदर के साथ तक्षशिला से 'कैलानस' (Kalanos - जिनका मूल नाम 'कल्याण' माना जाता है) नामक संन्यासी यूनान की ओर चले थे
    • विश्लेषण: ऐतिहासिक दृष्टि से कैलानस का देहांत सूसा (आधुनिक ईरान) में आत्म-दाह (सल्लेखना/समाधिमरण के समकक्ष यूनानी व्याख्या) द्वारा हुआ था, वे स्वयं एथेंस नहीं पहुंचे थे हालांकि, उनके साथी दादामिस (Dandamis) और अन्य भारतीय संन्यासियों के विचारों का प्रभाव सिकंदर और यूनानी दार्शनिक परंपरा (विशेषकर पाइरोनियन संदेहवाद और स्टोइक दर्शन) पर स्पष्ट रूप से दर्ज है
  • पाइथागोरस का संबंध:
    • कालक्रमिक स्पष्टीकरण: पाइथागोरस (लगभग ५७०४९५ .पू.) सिकंदर (३५६३२३ .पू.), प्लेटो और अरस्तू से पहले हुए थे पाइथागोरस कभी सिकंदर के बाद एथेंस के संपर्क में नहीं आए यद्यपि पाइथागोरस का शाकाहार, जीवों के प्रति दया और पुनर्जन्म का सिद्धांत जैन श्रमण परंपरा से गहरा साम्य रखता है, लेकिन सिकंदर के माध्यम से उनका प्रभावित होना कालक्रमिक (Chronological) दृष्टि से त्रुटिपूर्ण है
  • बर्नार्ड शॉ और अन्य पाश्चात्य उद्धरण:
    • जॉर्ज बर्नार्ड शॉ (प्रसिद्ध नाटककार और आजीवन शाकाहारी) ने कई अवसरों पर भारतीय अहिंसा और जैन सिद्धांतों की सराहना की थी इसी प्रकार, अल्बर्ट आइंस्टीन और डॉ. हरमन जैकोबी जैसे प्राच्यविद्याविदों (Indologists) ने जैन दर्शन के तर्कशास्त्र और परमाणु सिद्धांत की गहराई को स्वीकारा है

. भाषा, संप्रेषण और सामाजिक समरसता

आलेख में यह महत्वपूर्ण बिंदु उठाया गया है कि जैन तीर्थंकरों ने अभिजात्य वर्ग की भाषा के स्थान पर जनभाषा को चुना:

  • प्राकृत और अर्धमागधी का चयन: भगवान महावीर और पूर्ववर्ती तीर्थंकरों ने अपने उपदेश अर्धमागधी और विभिन्न प्राकृत रूपों में दिए इसका उद्देश्य ज्ञान का लोकतंत्रीकरण (Democratization of Knowledge) था, ताकि समाज के अंतिम व्यक्ति तक दर्शन की पहुंच हो सके
  • प्रतीकात्मक शस्त्र-विहीनता: हिंदू, ग्रीक या अन्य पौराणिक परंपराओं में देवताओं के हाथों में आयुध (शस्त्र) अधर्म के नाश के प्रतीक के रूप में दिखते हैं इसके विपरीत, २४ तीर्थंकरों का रूप पूर्णतः वीतरागी, ध्यानस्थ और निहत्था है उनके चिन्ह (लांछन) प्रकृति के सहचरजैसे बैल, अश्व, सर्प, सिंह, जलचर आदि हैं, जो पारिस्थितिक संतुलन और जीवमात्र की सह-अस्तित्व की भावना को प्रकट करते हैं

. २१वीं सदी की चुनौतियां एवं जैन दार्शनिक समाधान

आधुनिक वैश्विक संकट

पारंपरिक दृष्टिकोण     

 

जल एवं खाद्य संकट

तकनीकी‌‌ नीतिगत प्रबंधन

 

अप्काय' (जल-कायिक जीवों) की रक्षा, आहार संयम, एवं अनिवार्य शाकाहार मांस उद्योग द्वारा होने वाले जल दोहन (Water Footprint) को समाप्त करना

जलवायु असंतुलन

सीमितकार्बन क्रेडिट्स

 

'अपरिग्रह' आधारित उपभोग, प्रकृति का न्यूनतम दोहन, पदयात्रा संस्कृति (कम कार्बन उत्सर्जन)

लैंगिक असमानता

वैधानिक अधिकार

 

श्रमण परंपरा में साध्वी संघ (आर्यिका संघ) को आध्यात्मिक नेतृत्व देना; आत्मा के स्तर पर लिंग-भेद का विखंडन (भेदविज्ञान)

  • भेदविज्ञान और आधुनिक भौतिकी: लेख में आत्मा और एटम (Atom) की जो तुलना की गई है, वह जैन दर्शन के 'जीव' (चेतन) और 'पुद्गल' (अचेतन/भौतिक द्रव्य) के सिद्धांत से मेल खाती है जैन दर्शन में पुद्गल का सूक्ष्मतम रूप 'परमाणु' कहलाता है भेदविज्ञान का अर्थ है देह (पुद्गल) और आत्मा (चेतन) की भिन्नता को जानकर आत्म-स्वरूप में स्थित होना

. निष्कर्ष

मुजफ्फर हुसैन का आलेख वस्तुतः धार्मिक रूढ़िवादिता से परे हटकर जैन दर्शन को एक सार्वभौमिक वैज्ञानिक जीवन पद्धति के रूप में प्रस्तुत करता है यद्यपि आलेख में कुछ ऐतिहासिक विवरणों (जैसे पाइथागोरस का कालक्रम) में लोकप्रिय आख्यानों का सम्मिश्रण दिखता है, परंतु उनका मूल निष्कर्ष निर्विवाद है:

२१वीं सदी में यदि मानवता को युद्ध, जलवायु विनाश और असहिष्णुता से बचना है, तो उसे संगठित शस्त्र-बल या संकीर्ण राष्ट्रवाद के बजाय अहिंसा, अनेकांतवाद, अपरिग्रह और शाकाहार के व्यावहारिक धरातल पर ही लौटना होगा यही कारण है कि जैन जीवन-दर्शन २१वीं सदी की विचार-संरचना का केंद्र बनने की पूर्ण क्षमता रखता है

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