मनुष्य पर्याय और उत्तरोत्तर सिद्ध अवस्था की प्राप्ति के सोपान

मनुष्य पर्याय और उत्तरोत्तर सिद्ध अवस्था की प्राप्ति के सोपान                
   जैन दर्शन का सार-संक्षेप
      तत्व ज्ञानी सम्पूर्ण मनुष्य को देखकर इसमें से दो पृथक-पृथक तत्व निकाल ही लेंगे। पहला जीव और दूसरा अजीव। इसमें एक जानने वाला है जो जीव है और, जो कुछ नहीं जानता धड़ मात्र है, वह अजीव है। इस जीव (आत्मा) का शरीर (अजीव) के साथ जो संयोग होता है उसे ही सजीव कहा गया है। मनुष्य का धड़ होने से इसी सजीव को मनुष्य कहते हैं। इसमें जीव है, वह आत्मा या चेतन है, और जो धड़ है वह अजीव है वह शरीर मात्र जड़ है या अचेतन है। शरीर में ज्ञान नहीं है, शरीर सुख-दुःख का अनुभव नहीं कर सकता, सुख-दुख का अनुभव चेतना करती है। जीव-अजीव का यह संबंध कुछ निश्चित काल तक रहता है। जब यह संबंध खत्म हो जाता है उसे मरण कहते हैं। संबंध खत्म हुआ, मरण हुआ किन्तु न जीव का अंत हुआ और न अजीव का याने शरीर के परमाणुओं का। मरण के उपरांत जीव का अन्य शरीर के साथ जो संबंध होता है उसे जन्म कहते हैं। अजीव अर्थात शरीर के परमाणु का दूसरे परमाणु (राख-मिट्टी) में परिवर्तन हो जाता है। जन्म से लेकर मरण तक जीवन अथवा आयु है, उसे भव कहते हैं। मनुष्य की अपेक्षा से इसे मनुष्य भव अथवा मनुष्य पर्याय कहते हैं। पर्याय याने अवस्था। मनुष्य की पर्याय ही मोक्ष प्राप्ति की एक मात्र पर्याय है। इस पर्याय में रहकर मनुष्य अपनी बुद्धि का सार्थक उपयोग कर सकता है। जीव के गुणधर्म को अच्छी तरह जान सकता है। अपने शरीर में विराजित जीव (आत्मा) की पूर्ण शुद्ध अवस्था को प्राप्त करते हुए मोक्ष की अवस्था को प्राप्त कर सकता है।

      मनुष्य की ऐसी अवस्था सचमुच जीव की अवस्था नहीं है अपितु, जीव+शरीर के संयोग की अवस्था है। दोनों का यह जो संयोग हुआ उसके गुणधर्म शुद्ध जीव द्रव्य से भिन्न हैं। इसमें जो जीव है वह तो जानने वाला, मानने वाला, जागृत है, अनुभव, प्रतीति करने वाला है। यह जीव अपने पृथक अस्तित्व और पृथक गुणधर्म को न पहचान कर संयोग के अस्तित्व को अपना अस्तित्व मानता है। उसके गुणधर्मों को अपने गुणधर्म मानता है। अनभिज्ञ मनुष्य ने जीव और शरीर की संयोगी अवस्था को 'स्व' माना, इसलिए दृश्यमान शरीर ही 'मैं' हूँ ऐसी मिथ्या कल्पना इस मनुष्य रूपी जीव की जन्म से ही रहती है। शरीर का संयोग होने पर मैं जन्मा और वियोग में मैं मरा. शरीर के अनुकूल सामग्री में मैं सुखी और प्रतिकूल में मैं दुखी। ऐसी अनेक विविध मिथ्या कल्पनाओं के कारण यह जीव तथाकथित सुख-सामग्री प्राप्त करने के लिए विचार करता और उसके लिए  परिश्रम करता रहता है। 
      जैन धर्म का अर्थ है 'वस्तु स्वरूप' अथवा 'वस्तु विज्ञान'। प्राकृतिक विज्ञान (भौतिक/रसायन आदि  विज्ञान) में हम केवल Matter (पदार्थ) का अभ्यास करते हैं। परन्तु, जैन दर्शन में Matter यह छह द्रव्यों में से एक द्रव्य है। इन छह द्रव्यों में जीव भी एक द्रव्य है। जैन तत्त्वज्ञान में इन छह द्रव्यों का स्वरूप तो बताया ही है, मुख्यतः जीव द्रव्य का स्वरूप विस्तार से समझाकर अपने शुद्ध जीव स्वरूप का अनुभव कैसे करना है इसका विस्तार से वर्णन किया गया है। मैं स्वतः भी जीव द्रव्य हूँ इसलिए 'मेरा' स्वरूप क्या है? यह जानने की सभी की तीव्र अभिलाषा स्वाभाविक ही है। जिस प्रकार H₂O अर्थात् पानी के मूलतत्त्व हायड्रोजन और ऑक्सिजन हैं। हायड्रोजन एवं ऑक्सिजन का मिश्रण ही पानी है। इसमें 'O' अर्थात् ऑक्सिजन के गुणधर्म H₂O अर्थात् पानी के गुणधर्मों से भिन्न हैं । हमें यदि ऑक्सिजन के गुणधर्म जानने हो और उसे H₂O में से भिन्न करना हो तो सबसे प्रथम वह भिन्न गुणधर्म वाला है और उसे भिन्न किया जा सकता है, इसकी पूर्ण श्रद्धा होना जरूरी है। केमिस्ट्री के प्राध्यापकों से उसे सीखना पड़ेगा। शुद्ध ऑक्सिजन प्राप्त करने के लिए कौन सी प्रक्रिया करनी पड़ती है इसका अभ्यास करना पड़ेगा और उनके मार्गदर्शन में प्रत्यक्ष प्रयोग करने पर शुद्ध ऑक्सिजन प्राप्त करना सहज है, साध्य है इसे समझना होगा।
      ठीक इसी तरह जीव+शरीर के इस संयोग में से जीव द्रव्य के गुणधर्म उस संयोग के गुणधर्मों से भिन्न हैं। इस संयोग में से शुद्ध जीव भिन्न हो सकता है। जो जीव पूर्ण शुद्ध हो गये हैं उनके मार्गदर्शन के अनुसार प्रथमतः, शुद्धजीव पदार्थ के गुणधर्मों का स्वयं अभ्यास, ज्ञान करना होगा, शुद्ध जीव भिन्न कर सकते हैं ऐसी, श्रद्धा करनी होगी और वैसा प्रत्यक्ष प्रयोग करके अपने शुद्ध जीव का अनुभव करना होगा। जीव को यह स्वयं करना होगा, अन्य कोई जीव इसे किसी अन्य के लिए नहीं कर सकता। 
      जब यह जागृति, अनुभव, प्रतीति होगी तब इसे सम्यक्त्य हुआ माना जायेगा। अर्थात जीव को सम्यग्दर्शन (यथार्थ श्रद्धा), सम्यग्ज्ञान (यथार्थ ज्ञान) और सम्यक्चारित्र (यथार्थ आचरण) हो गया ऐसा कहा जायेगा । ऐसा जीव अपने आप को सदैव शरीर से भिन्न जानता अनुभव करता है और, वह अपनी आत्मा में ही स्थिर होने का बार-बार प्रयत्न करता है। आत्म स्थिरता बढ़ती जाती है तब व्रती श्रावक  अधिकाधिक लीनता और स्थिरता करते-करते दिगम्बरत्व  को धारण कर उत्तरोत्तर  वीतरागता, सर्वज्ञता, अरहंत, सिद्ध अवस्था को प्राप्त कर लेता है। मोक्ष की अवस्था को प्राप्त कर अरहंत अवस्था और उसके बाद इस जीव को सिद्ध अवस्था प्राप्त होती है। इस तरह जीव और शरीर का संयोग अब पूरी तरह हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है। 
🖋️आभार
26, सितंबर 2024

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