झूठ और सच की सवारी

'झूठ' के पास घोड़ा है और 'सच' के पास कछुआ

                                                🖋️ -प्रो (डॉ.) मुकेश जैन
                                   
        वर्तमान में तेजी से बदलते वैश्विक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में दिए जा रहे बयानों से अमेरिका के प्रसिद्ध साहित्यकार मार्क ट्वेन की प्रसिद्ध उक्ति सही बैठती है, विषय की शुरुआत उसी उक्ति  से करते हैं:

"सच जब तक अपने जूते पहन रहा होता है, तब तक झूठ आधी दुनिया का सफर तय कर लेता है।" -मार्क ट्वेन

         मार्क ट्वेन की इस सूक्ति को भारतीय दर्शन के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो इसका भाव कुछ इस प्रकार है:

    "झूठ के पास घोड़ा है और सच के पास कछुआ।"

         भारतीय दर्शन में ‘अश्व’ (घोड़ा) और ‘कच्छप’ (कछुआ) के चरित्रिक गुण (विशेषताएं) को समझ लेना भी ठीक है जो  कुछ इस तरह व्यक्त हैं: 

अश्व (घोड़े) के चारित्रिक गुण:

      घोड़े को शारीरिक बल, दुस्साहस और पराक्रम का प्रतीक माना गया है।  इसे अत्यधिक गतिशील, फुर्तीला और दूरी तय करने में सक्षम माना जाता है। इसकी तेजी को मानव जीवन की गतिशीलता से जोड़ा जाता है। घोड़े को अधीर, उत्तेजित और कभी-कभी अनियंत्रित स्वभाव का माना जाता है। इसकी तुलना मन की अस्थिरता से की गई है। इसे बुद्धि और विवेक से हीन माना जाता है। यह केवल शक्ति और गति का प्रतीक है, परंतु ज्ञान और सूझबूझ नहीं रखता। कुछ दार्शनिक ग्रंथों में घोड़े को अंधानुकरण करने वाला बताया गया है। जैसे, यह केवल दौड़ने और आदेश मानने में विश्वास रखता है, परंतु स्वयं निर्णय लेने की क्षमता नहीं रखता। यह बिना नियंत्रण के मनुष्य को भटका सकता है।

कच्छप (कछुआ) के चारित्रिक गुण:

       कछुआ अत्यंत धैर्यवान, शांत और स्थिर प्रकृति का प्राणी माना गया है। यह जल और थल दोनों में रह सकता है, जो जीवन की द्वैत स्थितियों में संतुलन बनाए रखने का संकेत देता है। कूर्मासन (योग में कछुआ मुद्रा) शरीर और मन को संयमित करने का प्रतीक है। समुद्र मंथन की कथा में भगवान विष्णु ने कछुए का रूप धारण कर मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर संभाला। यह सहयोग, धैर्य और विश्वास का प्रतीक है। कछुआ लंबी उम्र जीता है और खतरा होने पर स्वयं को सुरक्षित कर लेता है। यह सतर्कता और जीवन रक्षण का प्रतीक है। कछुआ अपने अंगों को समेटकर रखता है, ठीक वैसे ही जैसे एक साधक अपनी इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर अंतर्मुखी होता है। 

    “यथा कच्छपः कर-पादादिकं सर्वं अन्तः संहरति, तथा              विद्वान् इन्द्रियाणि सर्वाणि अन्तः संहरति।“

        कठोपनिषद (2.2.1) में आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए इंद्रियों को समेटने की तुलना कछुए के अंगों को समेटने से की गई है:
        (जैसे कछुआ अपने पैर और सिर को खोल के अंदर समेट लेता है, वैसे ही ज्ञानी व्यक्ति सभी इंद्रियों को विषयों से हटाकर अंतर्मुखी कर लेता है।)

झूठ के पास है अश्व सी गति और उत्तेजना: 

        झूठ अक्सर सनसनीखेज, भावनात्मक और सरल होता है। यह पूर्वाग्रहों को भड़काता है और सोशल मीडिया जैसे त्वरित माध्यमों से अंधाधुंध गति से फैलता है। इसे सत्यापित करने की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए इसकी यात्रा बिना किसी रुकावट के होती है।

सत्य के पास है कछुए सा धैर्य और विश्वास: 

        सत्य तथ्यात्मक, जटिल और कई बार उबाऊ होता है। इसके प्रसार के लिए जाँच, अनुसंधान, सबूत और विश्लेषण की आवश्यकता होती है। यह प्रक्रिया समय लेती है, और इस दौरान झूठ पहले ही लोगों की धारणा बना चुका होता है।
         ऐसा लगता है कि प्रकृति ने ही झूठ को घोड़े की सवारी और सच को कछुए की सवारी का वरदान दिया है। क्योंकि जब यह सामने आये तो झूठ का तिरस्कार और निरादार हो और सबके सामने से पूर्णतः हट जावे जबकि, सच की गुणगान और आदर के साथ स्थापना हो और सभी इसे अंगीकार करें।

व्यावहारिक उदाहरण:

        वैश्विक इतिहास और वर्तमान बदलते राजनीतिक समीकरणों में इसके अनेकों उदाहरण मिलते हैं:

1. कोविड-19 महामारी: 

महामारी के शुरुआती दिनों में, वायरस की उत्पत्ति, उपचार और टीकों को लेकर अनेक भ्रांतियाँ और झूठ तेजी से फैले (जैसे “5G टावर वायरस फैला रहे हैं”, “टीके में माइक्रोचिप है”)। जब तक वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य एजेंसियों के पास इन झूठों का खंडन करने के लिए ठोस सबूत और डेटा आता, तब तक वे झूठ दुनिया भर में फैल चुके होते थे और लोगों के व्यवहार को प्रभावित कर चुके होते थे। अंततः, सच की जीत हुई और लोगों ने इसे अपनाया।

2. सामाजिक मीडिया पर अफवाहें: 

         किसी सेलिब्रिटी की मृत्यु, दुर्घटना या राजनीतिक षड्यंत्र से जुड़ी एक फर्जी खबर कुछ ही मिनटों में वायरल हो जाती है। उसकी सच्चाई का पता लगाने में घंटों या दिन लग जाते हैं, और तब तक लाखों लोग उस झूठ को सच मान चुके होते हैं। आखिर जब सच सामने आता है तो झूठ फैलाने वाले ही मुख्य धारा से बाहर हो चुके होते हैं।

हाल के तीन प्रमुख राजनैतिक उदाहरण:

1. म्यांमार स्थित भारत-विरोधी उग्रवादी समूह के विरुद्ध ऑपरेशन:

        झूठ का चक्कर (पाकिस्तान का दावा): भारतीय सेना ने म्यांमार में ULFA(I) के कैंपों पर सटीक हमले किए। ये हमले इसलिए किए गए ताकि आतंकवादी संगठन के बड़े नेता जो भारत से दूर म्यांमार में छुपे हुए थे, उन्हें निशाना बनाया जा सके। सूत्रों से पता चला है कि ये हमले बहुत ही सटीक थे। इसमें लोइटरिंग म्यूनिशन्स और ड्रोन का इस्तेमाल किया गया। लोइटरिंग म्यूनिशन्स एक तरह के हथियार होते हैं जो हवा में मंडराते रहते हैं और सही मौका देखकर हमला करते हैं। इन हमलों में दूर से ही निशाना साधा गया। तुरंत ही, पाकिस्तानी मीडिया और सोशल मीडिया पर एक झूठ तेजी से फैलना शुरू हो गया कि यह ऑपरेशन पाकिस्तान के खिलाफ किया गया था। यह दावा बिना किसी सबूत के भारत-विरोधी narrative को बढ़ावा देने के लिए किया गया।

        सच्चाई का फिता बाँधना (भारत का स्पष्टीकरण): भारत सरकार और सेना ने स्पष्ट किया कि यह ऑपरेशन म्यांमार स्थित भारत-विरोधी उग्रवादी समूहों के खिलाफ था, न कि पाकिस्तान के खिलाफ। उन्होंने तथ्य और ऑपरेशन के सही लक्ष्य को सामने रखा।

       यहाँ, पाकिस्तान में फैलाया गया झूठ (भारत द्वारा पाकिस्तान पर हमला) तेजी से “दुनिया का चक्कर” लगा गया, खासकर उन लोगों के बीच जो पहले से ही एक गढ़ी कहानी को सुनने के इंतजार में थे। दूसरी ओर, भारत का सच (म्यांमार में ऑपरेशन) एक औपचारिक, तथ्य-आधारित बयान के रूप में आया, जो धीमी गति से देर से ही सही, लेकिन अंततः सही जानकारी प्रसारित कर पाया।

2. डोनाल्ड ट्रंप का कश्मीर मध्यस्थता का दावा और पाकिस्तान का खंडन:

        झूठ का चक्कर (ट्रंप का दावा): 2019 के एक विवादास्पद दावे में, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ मध्यस्थता करने के लिए कहा था। यह एक बहुत बड़ा और सनसनीखेज दावा था, क्योंकि भारत की लंबे समय से चली आ रही विदेश नीति कश्मीर को एक द्विपक्षीय मुद्दा मानती है और किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को स्पष्ट रूप से खारिज करती है।

        सच्चाई का फीता बाँधना (तत्काल खंडन): ट्रंप के दावे के कुछ ही घंटों के भीतर, भारत के विदेश मंत्रालय ने तेजी से और स्पष्ट शब्दों में इसका खंडन कर दिया। एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा गया कि ऐसी कोई बात प्रधानमंत्री मोदी ने नहीं कही है। दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने भी, जो आमतौर पर ऐसे मध्यस्थता के प्रस्ताव का स्वागत करता, यह स्वीकार किया कि उन्हें ऐसा कोई आमंत्रण नहीं मिला था। इस तरह दोनों देश एक दुर्लभ मौके पर सहमत हुए।

3. ट्रम्प का ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मध्यस्थता सम्बंधी एक और झूठ: 

        अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतवर्ष में आकर किए गए आतंकी हमले और निर्दोष नागरिकों की हत्या के बाद भारत को पाकिस्तान के खिलाफ सिंदूर ऑपरेशन और ट्रम्प का यह झूठ कि उन्होंने ही ऑपरेशन सिंदूर को खत्म करने के लिए दोनों देशों के बीच मध्यस्थता कर इसे समाप्त कराया था। इस पर पाकिस्तान की चुप्पी ने खूब  सुर्खियां बटोरी। ट्रम्प का यह झूठ घोड़े पर सवार होकर निकला तो सही फिर भी इतने दिनों बाद ही धीरे-धीरे चलते ही सही  16 सितम्बर, 2025 को भारतवर्ष के कछुआ रूपी सच से सामना हो ही गया जब पाकिस्तान के विदेश मंत्री श्री डार ने यह कहते हुए इस सच को स्वीकार कर लिया कि, 'पाकिस्तान की तो यह मांग रही है , लेकिन भारत ने इसे बार-बार ‘एक पक्षीय’ मुद्दा कहकर अस्वीकार कर दिया, और ऐसा ही ऑपरेशन सिंदूंर के समय भी हुआ था'। इतनी देर बाद ही सही आखिर सच सामने आ ही गया और ट्रम्प के सारे दावे अपने आप झूठे सिद्ध हुए। देश का प्रत्येक सच्चा नागरिक गर्व से भर गया। दुनिया के सामने एक बार फिर ट्रम्प की ही नहीं पाकिस्तान की भी फ़जीहत हुई, इनका वास्तविक चाल, चरित्र और चेहरा सबके सामने आया। अंततः, पूरे विश्व को भारत के कथन को सच मानना पड़ा। भारत के धैर्यवान, शांत और स्थिर प्रकृति के देश के रूप में प्रशंसा हो रही है, और इससे तीसरी दुनिया के बीच भारत का विश्वास बढ़ा है।

निष्कर्ष: 

         बहूचर्चित विवादास्पद मामले में, ट्रंप का झूठ (या गलत जानकारी) तेजी से दुनिया भर की सुर्खियाँ बटोरने लगा। लेकिन भारत की त्वरित और दृढ़ प्रतिक्रिया ने सच को अपने जूते का फीता बाँधने में ज्यादा समय नहीं लगने दिया। यह एक ऐसा उदाहरण है जहाँ सच्चाई ने झूठ को बहुत जल्दी पकड़ लिया और उसके प्रसार को सीमित कर दिया। यह दर्शाता है कि स्पष्ट और त्वरित प्रतिक्रिया झूठ के प्रभाव को कम कर सकती है। 

        हालाँकि, ‘सिंदूर ऑपरेशन’ और ‘ट्रंप के दावे’ के उदाहरण एक दूसरे के विपरीत एक महत्वपूर्ण बिंदु उजागर करते हैं झूठ के दावे का प्रभाव सत्य की प्रतिक्रिया की गति और स्पष्टता पर निर्भर करती है। जहाँ पाकिस्तानी प्रोपेगंडा के मामले में सच्चाई को फैलने में समय लगा, वहीं ट्रंप के दावे के मामले में तत्काल और स्पष्ट खंडन ने झूठ को लंबी दूरी तय करने से रोक दिया। 

        आज का मीडिया लैंडस्केप नागरिकों से अधिक जिम्मेदारी की माँग करता है। सूचना के प्रति सतर्क रहना, स्रोतों की पड़ताल करना और त्वरित निष्कर्ष न निकालना ही वह हथियार है जिससे हम सच को उसके “जूते का फीता बाँधने” में मदद कर सकते हैं और झूठ को “दुनिया का चक्कर” लगाने से रोक सकते हैं। अंततः, सत्य की जीत होती है, लेकिन उसकी यात्रा में हमारी सतर्कता, त्वरित निर्णय और बौद्धिक ईमानदारी ही उसका सबसे बड़ा सहयोगी है।

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