विभिन्न दर्शनों का गणितीय योगदान

भारतीय ज्ञान परम्परा में विभिन्न दर्शनों का गणितीय योगदान : जैन दर्शन के विशेष संदर्भ में 

                                -प्रोफेसर (डॉ.) मुकेश जैन

        भारत में 'दर्शन' शब्द का अर्थ उस ज्ञान से है जिसके माध्यम से तत्त्व (वास्तविकता) का सही ज्ञान प्राप्त किया जा सके। इसे 'तत्त्व दर्शन' भी कहा जाता है, जिसका मूल उद्देश्य पदार्थ और अस्तित्व के सत्य को समझना है। भारतीय दर्शनशास्त्र का उद्भव मानवीय पीड़ा से मुक्ति दिलाने और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करने की आवश्यकता से हुआ था। ऐसा माना जाता है कि हृदय के संदेह और दुःख तभी दूर होते हैं जब सत्य का साक्षात्कार हो जाता है।

        जैन दर्शन इस सिद्धांत को और आगे बढ़ाता है। इसके अनुसार, जब व्यक्ति को सम्यक दृष्टि (सही दृष्टिकोण) प्राप्त हो जाती है, तो कर्म उसे बाँध नहीं पाते। जिनके पास यह सम्यक दृष्टि नहीं होती, वे ही संसार के मोह-माया के जाल में फंसते रहते हैं। भारतीय ऋषि-मुनियों ने संसार के रहस्यों को विभिन्न कोणों से समझने का प्रयास किया है, और इन्हीं गहन चिंतनों के परिणामस्वरूप दार्शनिक ग्रंथों का निर्माण हुआ।

        ये दार्शनिक ग्रंथ, जिन्हें 'दर्शनशास्त्र' भी कहा जाता है, का शब्दिक अर्थ "शासु अनुशिष्टौ" अर्थात् 'ज्ञान की शिक्षा' या 'निर्देश' से लिया गया है। इन ग्रंथों में जीवन, जगत और परम सत्य से जुड़े गूढ़ प्रश्नों के उत्तर तर्क और योग के माध्यम से खोजे गए हैं।

भारतीय दार्शनिकों के बारे में टी एस एलियट (T.S. Eliot Society at the University of Michigan) ने कहा था[1]

Indian philosophers’ subtleties make most of the great European philosophers look like school boys.

(अर्थ: भारतीय दार्शनिकों की सूक्ष्मता के कारण अधिकांश महान यूरोपीय दार्शनिक स्कूली छात्र जैसे प्रतीत होते हैं।)

        भारतीय दर्शन के उद्भव के बारे में प्रामाणिक रूप से निश्चित तथ्यों का अभाव है, परंतु यह स्पष्ट है कि उपनिषद् काल तक आते-आते दर्शनशास्त्र एक स्वतंत्र अनुशासन के रूप में विकसित होने लगा था। भारत में तत्त्व-जिज्ञासा और वास्तविकता की खोज की परंपरा वैदिक युग जितनी प्राचीन है।ऋग्वेद के अति प्राचीन काल से ही भारतीय चिंतन में दो स्पष्ट प्रवृत्तियाँ एवं दोहरे लक्ष्य दृष्टिगोचर होते हैं:

1. प्रवृत्तियाँ:

  • अंतर्ज्ञानवादी (Intuitionist) प्रवृत्ति: यह प्रतिभा और बुद्धि पर आधारित है, जो तत्त्वों का सीधा साक्षात्कार एवं विश्लेषण करने में सक्षम है।
  •  बुद्धिवादी (Rationalist) प्रवृत्ति: यह तर्क और युक्ति पर निर्भर है, जो तत्त्वों की विवेचनात्मक समीक्षा एवं जाँच करती है।

2. लक्ष्य:

  • भौतिक लक्ष्य (अर्थ): धन एवं सांसारिक समृद्धि की प्राप्ति।
  • आध्यात्मिक लक्ष्य (ब्रह्म): मोक्ष या परम सत्य की प्राप्ति।

        इस प्रकार, भारतीय दर्शन का विकास इन दोनों समानांतर प्रवृत्तियों—अंतर्ज्ञान की गहरी अनुभूति और तर्क की कठोर समीक्षा—के सहअस्तित्व से हुआ, जिसका उद्देश्य मानव जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक दोनों पहलुओं को समझना और उनमें सामंजस्य स्थापित करना था।

        ज्ञान-आधारित और तर्क-आधारित प्रवृत्तियों के पारस्परिक एकीकरण के कारण आत्मा का उपनिषद दर्शन स्पष्ट रूप से सामने आया। उपनिषदों का ज्ञान आत्मा और परमात्मा के एकीकरण को सिद्ध करने वाले शानदार वेदांत में परिणत हुआ। भारतीय ऋषि-मुनियों के उर्वर मस्तिष्क से निकले कर्म, ज्ञान और भक्ति के त्रिविध मार्ग के प्रवाह ने दूर-दूर तक मनुष्यों की आध्यात्मिक गंदगी को धोकर उन्हें पवित्र बना दिया। इस प्रयास ने राम /कृष्ण /महावीर /बुद्ध को शाश्वत शुद्ध और सदैव स्वच्छ बनाकर मानवता के विकास में योगदान दिया है। भारतवर्ष में इस पवित्र करने वाली धारा को लोग 'दर्शन' के नाम से भी पुकारते हैं। शोधकर्ताओं का मत है कि इस शब्द का वर्तमान अर्थ में प्रथम प्रयोग वैशेषिक दर्शन में हुआ।

भारतीय ज्ञान परम्परा में गणित का योगदान:

        भारतीय गणित के इतिहास को कालक्रमानुसार निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है:

1. प्राचीन गणित काल (लगभग 3000–600 ईसा पूर्व):

  • इस काल की गणितीय गतिविधियों के प्रमाण सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा और मोहनजोदड़ो) से मिलते हैं।
  • नगर नियोजन, इमारतों के निर्माण और मापन में दशमलव आधारित मानकीकृत प्रणाली का प्रयोग किया जाता था।
  • इस युग में गणित का विकास मुख्यतः वास्तुकला, व्यापार और प्रशासन की व्यावहारिक आवश्यकताओं से प्रेरित था।

2. जैन गणित काल (600 ईसा पूर्व – 500 ईस्वी):

  • जैन दार्शनिकों ने गणित को अनंत, समुच्चय सिद्धांत और संयोजन गणित जैसे अमूर्त विषयों तक विस्तारित किया।
  • इस काल में शून्य, द्विपद गुणांक और पुनरावृत्ति सूत्र जैसी अवधारणाओं का प्रारंभिक विकास हुआ।
  • गणित को दार्शनिक और आध्यात्मिक चिंतन का हिस्सा माना गया।

3. ब्राह्मी संख्या और शून्य का विकास:

  • ब्राह्मी लिपि में संख्याओं का प्रारंभिक रूप विकसित हुआ, जो बाद में दशमलव स्थानीय मान प्रणाली का आधार बना।
  • शून्य की अवधारणा को एक संख्या के रूप में परिभाषित किया गया, जिसने गणितीय संक्रियाओं को क्रांतिकारी रूप से बदल दिया।

4. भारतीय गणित का स्वर्णिम युग (500–1200 ईस्वी):

  • इस दौरान आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, भास्कर द्वितीय जैसे विद्वानों ने बीजगणित, त्रिकोणमिति और कलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
  • शून्य और ऋणात्मक संख्याओं का औपचारिक उपयोग शुरू हुआ।
  • साइन फलन, द्विघात समीकरणों के हल और अनंत श्रृंखलाओं जैसी अवधारणाओं का विकास हुआ।

5. आधुनिक युग (1200 ईस्वी के बाद):

  • भारतीय गणित का अरब और यूरोपीय विद्वानों के माध्यम से वैश्विक प्रसार हुआ।
  • इस युग में केरल स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स ने अनंत श्रृंखलाओं और कैलकुलस के विकास में योगदान दिया।

        भारतीय गणित का विकास व्यावहारिक आवश्यकताओं से शुरू हुआ, जैन और बौद्ध दर्शन से प्रेरणा लेकर अमूर्त चिंतन तक पहुँचा, और अंततः वैश्विक गणित की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसमें दशमलव प्रणाली, शून्य और बीजगणित जैसे योगदान अमिट हैं।

        आर्यभट्ट प्रथम, ब्रह्मगुप्त, भास्कर प्रथम, महावीर, आर्यभट्ट द्वितीय और भास्कराचार्य या भास्कर द्वितीय भारतीय गणित के शास्त्रीय युग के प्रसिद्ध गणितज्ञों में से एक हैं। इस अवधि के दौरान, गणितीय अनुसंधान के दो केंद्र उभरे। एक केंद्र पाटलिपुत्र के पास कुसुमपुरा और - दूसरा केंद्र उज्जैन में था। आर्यभट्ट प्रथम, कुसुमपुरा के प्रमुख व्यक्तित्व थे। उनकी प्रमुख खोजों में से एक खोज रैखिक समीकरणों को हल करने की विधि थी। आर्यभट्ट के अन्य महत्वपूर्ण योगदानों में पाई (Pi) का चार दशमलव स्थानों (3.1415) तक मान भी है। आधुनिक युग में भी भारतीय मूल के गणितज्ञों ने कई महत्वपूर्ण खोजें की हैं। रामानुजन (1887- 1920), जो कि प्रसिद्ध आधुनिक भारतीय गणितज्ञों में से एक हैं, ने संख्या सिद्धांत के कई पहलुओं में महत्वपूर्ण और सुंदर परिणाम उत्पन्न किए। उनकी सबसे स्थायी खोज मॉड्यूलर (Modular) रूपों का अंकगणितीय सिद्धांत माना जाता है। उनकी अन्य उपलब्धियां हैं :

  • लैंडॉ-रामानुजन् स्थिरांक
  • रामानुजन्-सोल्डनर स्थिरांक
  • रामानुजन् थीटा फलन
  • रॉजर्स-रामानुजन् तत्समक
  • रामानुजन् अभाज्य
  • कृत्रिम थीटा फलन, आदि

        इसी प्रकार अन्य प्रसिद्ध आधुनिक भारतीय गणितज्ञ मंजुल भार्गव का गणितीय योगदान संख्या सिद्धांत (Number Theory) और बीजगणितीय ज्यामिति (Algebraic Geometry) के क्षेत्र में अद्वितीय है। उनका सबसे महत्वपूर्ण कार्य कार्ल फ्रेडरिक गाउस के द्विघात रूपों (Quadratic forms) के शास्त्रीय रचना नियमों का व्यापक सामान्यीकरण करना था, जिसके लिए उन्हें गणित का सर्वोच्च सम्मान "फील्ड्स मेडल" प्राप्त हुआ। गणित के क्षेत्र में भारत के योगदान के ऐसे अनेकों उदाहरण हैं, जिनका उपयोग आज न केवल भारत बल्कि पूरा विश्व कर रहा है।[2] भारतीय गणित की इस समृद्ध विरासत ने विश्व के गणितीय ज्ञान को गहराई से प्रभावित किया है और आज भी इसकी प्रासंगिकता और महत्व को स्वीकार किया जाता है। 

        गणित के क्षेत्र में यदि भारत के योगदान की बात की जाए, तो शून्य की अवधारणा देने के साथ-में उपयोग किया जाता है। शून्य की अवधारणा का सूत्रपात भी भारत में ही भक्षाली पांडुलिपि से हुआ है। शून्य की अवधारणा के आगमन से संख्याओं को कुशलतापूर्वक और विश्वासपूर्ण तरीके से लिखा जाने लगा। सातवीं शताब्दी में, शून्य के साथ उपयोग किये जाने वाले नियमों के पहले लिखित प्रमाण को ब्रह्मसुप्ता सिद्धांत (Brahmasputha Siddhanta) में औपचारिक रूप दिया गया था। खगोलशास्त्री ब्रह्मगुप्त ने अपने इस प्राथमिक विषय में द्विघात समीकरणों को हल करने और वर्गमूलों की गणना के लिए नियम पेश किए। ब्रह्मगुप्त ने ऋणात्मक संख्याओं के साथ उपयोग होने वाले नियमों को भी प्रदर्शित किया। 

        यूरोपीय गणितज्ञ कई वर्षों तक ऋणात्मक संख्या को सार्थक मानने से हिचकते रहे किंतु 17 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में यूरोपीय गणितज्ञ गॉटफ्रीड विल्हेम लीबनिज (Gottfried Wilhelm Leibniz) ने अपने अवकलन-शास्त्र (Calculus) के विकास में शून्य और ऋणात्मक संख्याओं को एक साथ, भारतीय गणितज्ञों ने गणित के विभिन्न क्षेत्रों जैसे त्रिकोणमिति, बीजगणित, अंकगणित और ऋणात्मक संख्याओं के अध्ययन में भी मौलिक योगदान दिया है। संख्या प्रणाली की बात करें, तो 1200 ईसा पूर्व तक, गणितीय ज्ञान को ज्ञान के एक बड़े हिस्से के रूप में लिखा गया था, जिन्हें वेदों के रूप में जाना जाता है। 

        इन ग्रंथों में, संख्याओं को सामान्यतः दस की घातों (Power) के संयोजन के रूप में व्यक्त किया गया था। उदाहरण के लिए 365 को तीन सौ या सैकड़ों (3x102), छह दहाई (6x101), पांच इकाइयों (5x10°) के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। हालांकि दस की प्रत्येक घात को प्रतीकों के एक समूह के बजाय एक नाम के साथ दर्शाया गया।[3] [4] इस प्रकार यह माना जा सकता है कि, दस की घातों के उपयोग ने भारत में दाशमिक या दशमलव-स्थान प्रणाली के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से, हमारे पास ब्राह्मी अंकों के लिखित प्रमाण भी मौजूद हैं, जो आधुनिक, भारतीय या हिंदू-अरबी अंक प्रणाली का अग्रदूत माना जाता है तथा दुनिया के अधिकांश हिस्सों माना जाता है। इसी प्रकार अन्य प्रसिद्ध आधुनिक भारतीय गणितज्ञ मंजुल भार्गव को 'त्रिचर द्विघात (Ternary Quadratic)' रूपों के लिए संयोजन विधि की खोज करने का श्रेय दिया जाता है।[4]            

        गणित के क्षेत्र में भारत के योगदान के ऐसे अनेकों उदाहरण हैं, जिनका उपयोग आज न केवल भारत बल्कि पूरा विश्व कर रहा है। इस तरह, भारतीय ज्ञान परम्परा में गणित के आधारभूत सिद्धांतों के विकास में दिया गया योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। प्राचीन भारतीय गणितज्ञों ने संख्या प्रणाली, शून्य की अवधारणा, दशमलव, स्थानीय मान, बीजगणित, ज्यामिति, और कैलकुलस जैसे क्षेत्रों में अग्रणी योगदान दिया है । वेदों में गणित के विभिन्न पहलुओं का उल्लेख मिलता है, और यजुर्वेद में खगोलशास्त्र (ज्योतिष) के विद्वानों को 'नक्षत्रदर्श' कहा गया है। छान्दोग्य उपनिषद् में गणित को 'राशि विद्या' के नाम से जाना गया है । ब्रह्मगुप्त, आर्यभट्ट, भास्कराचार्य जैसे गणितज्ञों ने अपने ग्रंथों में गणितीय सिद्धांतों को स्थापित किया, जिनका उपयोग आज भी विश्व भर के गणितज्ञ करते हैं। ब्रह्मगुप्त ने द्विघात समीकरणों और वर्गमूलों की गणना के लिए नियम प्रस्तुत किए, और ऋणात्मक संख्याओं के साथ उपयोग होने वाले नियमों को भी प्रदर्शित किया।[5]&[6]

भारतीय ज्ञान परम्परा और जैन दर्शन:[7]

        जैन गणित काल (600 ईसा पूर्व – 500 ईस्वी) में जैन ब्रह्मांड विज्ञान की दार्शनिक अवधारणाओं ने अनंत (infinity) के गणितीय सिद्धांतों को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस अवधि में गणित के क्षेत्र में हुई प्रमुख उन्नतियाँ इस प्रकार हैं:

1. अनंत की अवधारणा का विकास:

  • जैन दर्शन में ब्रह्मांड की अनंत प्रकृति के चिंतन से अनंत के अनुक्रम (sequences of infinity) और अनंत समुच्चय (infinite sets) जैसी गणितीय धारणाओं का उद्भव हुआ।
  • इन अवधारणाओं ने भारतीय गणित को अमूर्त चिंतन (abstract reasoning) की ओर अग्रसर किया।

2. संयोजन गणित (Combinatorics) और द्विपद गुणांक:

  • जैन गणितज्ञों ने द्विपद गुणांक (binomial coefficients) की पुनरावृत्ति सूत्रों (recurrence relations) की खोज की, जो आधुनिक "पास्कल के त्रिकोण" के समान है।

3. भिन्न, संख्या सिद्धांत और ज्यामिति:

  • भिन्नों (fractions) के सैद्धांतिक और व्यावहारिक उपयोग को विकसित किया गया।
  • संख्या सिद्धांत (number theory) में विभाज्यता, अभाज्य संख्याओं और गुणनखंडन पर कार्य हुआ।
  • ज्यामिति (geometry) में विभिन्न आकृतियों के क्षेत्रफल, परिमाप और आयतन की गणना के सूत्र प्रस्तुत किए गए।

4. गणितीय तर्क और प्रमाण:

  • जैन विद्वानों ने तार्किक प्रमाण (logical proofs) और गणितीय निगमन (deductive reasoning) पर बल दिया, जिससे गणित एक स्वतंत्र अनुशासन के रूप में मजबूत हुआ।

        जैन गणित काल ने न केवल अनंत और संयोजन गणित जैसी उन्नत अवधारणाओं को जन्म दिया, बल्कि दशमलव प्रणाली, शून्य और बीजगणित के विकास की भी पृष्ठभूमि तैयार की। इस युग की देन आधुनिक गणित की नींव रखने में सहायक सिद्ध हुई।

        जैन दर्शन के अनुसार, सृष्टि (ब्रह्मांड) अनादि और अनंत है अर्थात् इसका न तो कोई आदि है और न ही अंत। यह हमेशा से अस्तित्व में रही है और सदैव बनी रहेगी। इसे न तो किसी ईश्वर ने बनाया है और न ही किसी बाह्य शक्ति द्वारा इसका सृजन हुआ है। ब्रह्मांड स्वयंभू है और प्राकृतिक नियमों तथा अपनी ही आंतरिक ऊर्जा प्रक्रियाओं द्वारा संचालित एवं संरक्षित है। इस प्रकार, जैन धर्म शाश्वत ब्रह्मांड की अवधारणा को प्रतिपादित करता है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार, ब्रह्मांड की उत्पत्ति बिग बैंग (महाविस्फोट) सिद्धांत से हुई है। यह सिद्धांत बताता है कि लगभग 13.7 अरब वर्ष पहले समस्त पदार्थ और ऊर्जा एक अत्यंत सघन और गर्म बिंदु में संकेंद्रित थी, जिसके विस्फोट से ब्रह्मांड का विस्तार प्रारंभ हुआ। इस वैज्ञानिक व्याख्या के आधार पर यह तथ्य स्थापित होता है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति किसी अलौकिक सत्ता या ईश्वर द्वारा नहीं हुई। वहीं, भारतीय ज्ञान परंपरा विशेष रूप से जैन दर्शन ने गणितीय अवधारणाओं के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जैन ब्रह्मांड विज्ञान और गणित ने "अनंत" की अवधारणा को गहराई से विकसित किया। इसके अंतर्गत अनंत के अनुक्रम, भिन्न, संयोजन, संख्या सिद्धांत और ज्यामिति जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई। विशेष रूप से, द्विपद गुणांक और पास्कल के त्रिकोण जैसी संकल्पनाएँ एवं उनके पुनरावृत्ति सूत्र जैन गणितज्ञों द्वारा पहले से ही ज्ञात थे, जो उनकी गणितीय प्रगति का प्रमाण है। इस प्रकार, जहाँ एक ओर विज्ञान ने ब्रह्मांड की उत्पत्ति की व्याख्या की है, वहीं दूसरी ओर जैन दर्शन ने गणित के माध्यम से अनंत और ब्रह्मांड की प्रकृति को समझने का एक दार्शनिक एवं वैज्ञानिक ढाँचा प्रदान किया है।

        भारतीय ज्ञान परम्परा में जैन दर्शन का गणितीय योगदान अत्यंत समृद्ध, मौलिक और बहुआयामी है। जैन गणित ने केवल धार्मिक-अध्यात्मिक चिंतन ही नहीं, बल्कि विज्ञान, ज्यामिति, अंकगणित, खगोलशास्त्र, समय और ब्रह्मांडीय संरचना जैसी जटिल अवधारणाओं को तर्कसंगत और वैज्ञानिक आधार पर प्रस्तुत किया।[9]

        जैन ऋषियों में क्रमचय-संचय (Permutations and combinations) काफी लोकप्रिय था। जैन दर्शन के भगवती सूत्र, जिसे व्याख्याप्रज्ञप्ति भी कहा जाता है, में गणितीय व्याख्याएं और सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन है। इस ग्रंथ में गणितशास्त्र के अध्याय में क्रमचय-संचय (Permutations and Combinations) पर चर्चा की गई है। इसमें विभिन्न मौलिक दार्शनिक वर्गों को एक साथ लेने पर बनने वाले समुच्चयों की संख्या की गणना की गई है। 

  1. जैसे, दिये गये मौलिक दार्शनिक वर्गों को एक, दो, तीन या अधिक एक साथ लेने पर कितने समुच्चय बन सकते हैं। 
  2. इस ग्रन्थ में १-१ लेकर बने समुच्चयों (कम्बिनेशन्स) को 'अलक संयोग' कहा गया है, २-२ लेकर बने समुच्चयों को 'द्विक संयोग' कहा गया है और द्विक संयोग की संख्या n(n-1)/2 बतायी गयी है। भगवतीसूत्र में दीर्घवृत्त के लिये 'परिमण्डल' शब्द प्रयोग किया गया है और इसके दो भेद बताये गये हैं-
  3. समतल दीर्घवृत्त और घन दीर्घवृत्त ।

        इस प्रकार, जैन दर्शन के भगवती सूत्र में गणितीय व्याख्याएं और सिद्धांतों का गहरा अध्ययन और विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है, जो उस समय के गणितीय ज्ञान की गहराई और विस्तार को दर्शाता है। जैन गणितज्ञों ने अनंत की अवधारणा, बहुत बड़ी और जटिल संख्याओं के साथ काम करने (Principles of Logarithm), और विभिन्न गणितीय श्रेणियों और सूत्रों के विकास में भी योगदान दिया है। जैन गणित का एक उल्लेखनीय पहलू यह है कि इसमें अनंत की अवधारणा को बहुत महत्व दिया गया है, जो आधुनिक गणित में भी एक केंद्रीय विचार है। जैन दर्शन में गणितीय योगदान के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं:

  1. सिद्धसेन दिवाकर (500 ई.) ने 'लोकविभाग' नामक ग्रंथ में अनंत की अवधारणा पर चर्चा की थी।
  2. हरिभद्र (900 ई.) ने गणितीय तर्कों का उपयोग करते हुए जैन धर्म के सिद्धांतों को समझाया।
  3. मेरुतुंग (1400 ई.) ने जैन धर्म के विभिन्न गणितीय पहलुओं पर काम किया।

      जैन साहित्य में स्थाणांगसूत्र, तिलोयपण्णत्ति, अनुयोगद्वार सूत्र, भगवती सूत्र और महावीराचार्य का गणितसारसंग्रह गणितीय श्रृंखलाओं के महत्वपूर्ण और प्राचीन स्रोत हैं। इन ग्रंथों ने गणितीय श्रेणियों के सूत्र और व्यवहारिक विधियों का विकास किया है।  इन गणितज्ञों ने जैन दर्शन के अनुसार अनंत की अवधारणा, अनेकांतवाद, और स्याद्वाद के सिद्धांतों को गणितीय रूप से प्रस्तुत किया, जिससे गणित के क्षेत्र में नए आयाम खुले।[5] इस प्रकार, जैन दर्शन ने भारतीय ज्ञान परम्परा में गणित के विकास में एक अनूठा और मौलिक योगदान दिया है। योजनाकारों द्वारा थोपी हुई ब्रिटिश शिक्षा पध्दति के पाठ्यक्रमों को छोड़ इसी तरह के समृद्ध भारतीय परम्परागत ज्ञान को नवीन पाठ्यक्रमों में शामिल करने की बात की जा रही है, जो एक स्वागत योग्य कदम है।[8]

                                      =-=-=

Sources: संदर्भः

1. https://sites.lsa.umich.edu/tseliotsociety/resources-and-projects/popular-quotations-attributed-to-t-s-eliot/#:~:text=Misquoted%3B%20in%20After%20Strange%20Gods,schoolboys%E2%80%94lay%20in%20trying%20to

2.

https://theconversation.com/five-ways-ancient-india-changed-the-world- with-maths-84332

3. https://www.esamskriti.com/e/Spirituality/Education/A-brief-history-of-Indian-Mathematics-1.aspx

4.

भारतीय दर्शन - विकिपीडिया. https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF_%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6%E0%A4%A8.

5.

 भारतीय ज्ञान परम्परा और शोध | जम्बूद्वीप - the e-Journal of Indic .... http://journal.ignouonline.ac.in/index.php/jjis/article/view/933.

भारतीय ज्ञान परम्परा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति.

https://rashtriyashiksha.com/indian-knowledge-tradition-and-national-education-policy/.

6.

 विज्ञान, गणित और चिकित्सा के क्षेत्र में प्राचीन भारत के योगदान.

https://www.google.com/search?sca_esv=35b2ac92d41e214b&sxsrf=ADLYWIIMolVBw8cMfY4uPtfC5pQ6vUQz5g:1716752466206&q=bharat-ke-vigyan-ganit-me-yogdan&spell=1&sa=X&ved=2ahUKEwiFkamniayGAxXUklYBHfOpBbwQBSgAegQICBAB&biw=1536&bih=730&dpr=1.25

7.

जैन दर्शन - विकिपीडिया. https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9C%E0%A5%88%E0%A4%A8_%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6%E0%A4%A8.

8.

https://www.prarang.in/rampur/posts/7723/trees?utm_source=perplexity

9.

https://www.hindisaamana.com/jain-mathematics-is-a-living-and-relevant-intellectual-tradition/?utm_source=perplexity

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