आरएसएस एक परिचय

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस): एक विस्तृत परिचय

                                                                                                🖋️प्रो. डॉ. मुकेश जैन

                                                                                       (100वें स्थापना दिवस पर विशेष)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) भारत का एक देशव्यापी, हिन्दू राष्ट्रवादी, स्वयंसेवी, सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है। यह दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक माना जाता है। अपनी स्थापना के समय से ही यह संगठन विवाद और चर्चा का केंद्र रहा है, जिसके प्रशंसक इसे राष्ट्र निर्माण का अग्रदूत मानते हैं, जबकि आलोचक इसे साम्प्रदायिक और बहिष्कारवादी विचारधारा का प्रतीक देखते हैं।

स्थापना (1925):

स्थापना का समय और स्थान: 

आरएसएस की स्थापना 27 सितंबर, 1925 को विजयादशमी के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर, महाराष्ट्र में की थी।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: 

उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। हेडगेवार स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय थे और उनका मानना था कि अंग्रेजों से लड़ने के लिए और एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण करने के लिए हिन्दू समाज को संगठित, अनुशासित और सैद्धांतिक रूप से एकजुट होना आवश्यक है। उन्होंने महसूस किया कि हिन्दू समाज जाति-पांति, ऊंच-नीच और आपसी फूट के कारण कमजोर हो गया है।

प्रारंभिक स्वरूप: 

शुरुआत में केवल 5-6 लोगों के साथ एक दैनिक शाखा लगाने के साथ इसकी शुरुआत हुई।

इतिहास का सफर:

आरएसएस का इतिहास कई महत्वपूर्ण घटनाओं और परिवर्तनों से भरा है:

1. संस्थापक का योगदान (1925-1940): 

डॉ. हेडगेवार ने संघ की मूल संरचना, विचारधारा और कार्यप्रणाली को स्थापित किया। 1940 में उनके निधन के बाद माधव सदाशिव गोलवलकर ("श्री गुरुजी") सरसंघचालक बने।

2. गांधी हत्या और प्रतिबंध (1948): 

नाथूराम गोडसे, जो एक समय आरएसएस का सदस्य रह चुका था, ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी। इसके बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। तत्कालीन सरसंघचालक गोलवलकर ने इस प्रतिबंध को हटाने के लिए सरकार से बातचीत की और संघ ने यह स्पष्ट किया कि उसका गांधी हत्या से कोई लेना-देना नहीं है। अंततः 1949 में प्रतिबंध हटा लिया गया।

3. आपातकाल और सामाजिक स्वीकार्यता (1975-77): 

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान आरएसएस पर फिर से प्रतिबंध लग गया। इस अवधि में आरएसएस ने भूमिगत रहकर आपातकाल के खिलाफ जबरदस्त आंदोलन चलाया और हज़ारों की संख्या में इसके कार्यकर्ता जेल गए। इससे संघ की लोकप्रियता और स्वीकार्यता में काफी वृद्धि हुई।

4. राम जन्मभूमि आंदोलन (1980-90 का दशक): 

आरएसएएस ने विश्व हिन्दू परिषद (VHP) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ मिलकर राम जन्मभूमि आंदोलन को बड़े पैमाने पर संगठित किया। यह आंदोलन हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति के उभार का एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ।

5. विस्तार और वैश्विक पहुंच: 

समय के साथ, आरएसएस ने अपनी पहुंच का विस्तार किया और आज इसके दर्जनों "सहयोगी संगठन" (अफिलिएट्स) हैं, जो छात्रों, मजदूरों, महिलाओं, शिक्षा, राजनीति आदि विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं। इसकी शाखाएं अब दुनिया के 50 से अधिक देशों में लगती हैं।

उद्देश्य एवं विचारधारा:

आरएसएस का मुख्य उद्देश्य हिन्दू समाज का पुनरुत्थान और एक "हिन्दू राष्ट्र" की स्थापना करना है। इसके मूल में निम्नलिखित विचार और उद्देश्य निहित हैं:

चरित्र निर्माण और संस्कार: 

संघ का प्राथमिक उद्देश्य व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करना है, ताकि वह निस्वार्थ भाव से राष्ट्र की सेवा कर सके।

हिन्दू समाज का संगठन: 

जाति, भाषा, क्षेत्र और संप्रदाय के भेदभाव से ऊपर उठकर पूरे हिन्दू समाज को एक सूत्र में बांधना।

हिन्दुत्व की अवधारणा: 

आरएसएस "हिन्दुत्व" (Hindutva) को एक सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान के रूप में देखता है, न कि केवल एक धार्मिक पहचान के रूप में। इसके अनुसार, भारत हिन्दुओं की पितृभूमि है और यहाँ की संस्कृति मूलतः हिन्दू संस्कृति है।

स्वावलंबन और स्वदेशी: 

समाज को विदेशी विचारों और आर्थिक निर्भरता से मुक्त कर स्वावलंबी बनाना।

अनुशासन और एकात्मता: 

शाखा के माध्यम से अनुशासन, शारीरिक प्रशिक्षण और सामूहिक एकात्मता (एकता) की भावना का विकास करना।

कार्यप्रणाली: शाखा का महत्व:

आरएसएस की मूल इकाई और इसकी पहचान है "शाखा"। यह प्रतिदिन सुबह या शाम एक निश्चित स्थान पर लगने वाला एक सम्मिलित सत्र है, जिसमें निम्नलिखित गतिविधियाँ शामिल होती हैं:

खेल: टीम भावना को बढ़ावा देने वाले खेल।

शारीरिक प्रशिक्षण: योग, व्यायाम और दंड (लाठी) चलाना।

आध्यात्मिक और बौद्धिक चर्चा: प्रार्थना, राष्ट्रीय गीत, देशभक्ति से ओत-प्रोत बौद्धिक सत्र।

भगवा ध्वज के नीचे संगठन को प्रणाम: यह संगठन के प्रति निष्ठा का प्रतीक है।

उपलब्धियां एवं योगदान:

आरएसएस की उपलब्धियों को दो रूपों में देखा जा सकता है - सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक।

1. सामाजिक-सांस्कृतिक उपलब्धियां:

सामाजिक एकीकरण: 

आरएसएस ने विभिन्न जातियों और सामाजिक वर्गों के लोगों को एक मंच पर लाने का कार्य किया है।

आपदा प्रबंधन: 

प्राकृतिक आपदाओं जैसे भूकंप, बाढ़, सुनामी आदि के समय आरएसएस के स्वयंसेवक राहत और बचाव कार्यों में सबसे आगे रहते हैं। इसके लिए इसके संगठन "सेवा भारती" की विशेष भूमिका रही है।

शिक्षा का प्रसार: 

देश भर में हज़ारों की संख्या में स्कूल, छात्रावास और शैक्षणिक संस्थान चलाए जा रहे हैं, विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में।

वनवासी कल्याण: 

आदिवासी (वनवासी) समुदायों के बीच शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक उत्थान के लिए व्यापक कार्य किया गया है।

हिन्दू पहचान को मजबूती: 

हिन्दुत्व की विचारधारा को लोकप्रिय बनाने और हिन्दू समाज में आत्मविश्वास जगाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

2. राजनीतिक प्रभाव:

भारतीय जनता पार्टी (बी जे पी) का उदय: 

आरएसएस को भारतीय जनता पार्टी की मातृ संस्था माना जाता है। बीजेपी के अधिकांश नेता और कार्यकर्ता किसी न किसी रूप में आरएसएस से जुड़े रहे हैं। 2014 और 2019 के चुनावों में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत के पीछे आरएसएस के व्यापक संगठनात्मक संरचना और स्वयंसेवकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। देश की लोकप्रिय सरकार के शीर्षस्थ नेतृत्व ने इस ऐतिहासिक अवसर पर आर एस एस के योगदान और उसकी उपलब्धियों का सम्मान का सम्मान करते हुए स्मृति स्वरुप 100₹ का सिक्का राष्ट्र को समर्पित किया।

नीति निर्माण में प्रभाव: 

मौजूदा केंद्र सरकार की कई नीतियों और पहलों (जैसे- अनुच्छेद 370 का निरसन, राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 2020, नागरिकता संशोधन अधिनियम, राम मंदिर निर्माण) में आरएसएस के विचारों की स्पष्ट झलक देखी जा सकती है।

निष्कर्ष:

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने सौ साल के इतिहास में एक छोटे समूह से बढ़कर एक विशाल सामाजिक-सांस्कृतिक सत्ता का रूप ले लिया है। यह केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक विचारधारा और एक आंदोलन बन गया है। इसकी शक्ति इसके लाखों अनुशासित और निष्ठावान स्वयंसेवकों में निहित है। भले ही इसकी विचारधारा पर आज भी बहस जारी है, लेकिन यह निर्विवाद है कि समकालीन भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य को समझने के लिए आरएसएस की भूमिका और प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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