नेताजी के नारी शक्ति पर विचार

 शीर्षक: रटाए पूत और नारी शक्ति पर विचार

नुरागियों, यह नया जमाना है। बिना इमेज के अब प्रसिद्धि नहीं होती। नए युग की तकनीकों ने इमेज बनाने का एक बड़ा उद्योग खड़ा कर दिया है। अब पार्टी के लिए नारे बनाने से ऊपर उठकर हम किसी व्यक्ति विशेष के संबंध में उसकी कार्यशैली के यशोगान वाली फिल्में, पोस्टर और वृत्तचित्रों के युग में प्रवेश कर चुके हैं। जहाँ संबंधित की महिमा का राग-विहाग गाकर उसे मानव से देवता गढ़ देना आसान हो गया है।

अनुरागियों, ऐसे ही गढ़े हुए देवता रूपी नेता जी को एक अति महत्वपूर्ण अवसर पर सार्वजनिक जलसे में मुख्य वक्ता की हैसियत से ‘नारी शक्ति’ पर अपने विचार रखने के लिए आमंत्रित किया गया था। लिहाजा वह वहाँ विचार रखने अपने एक तकनीकी विशेषज्ञ का लिखा आलेख रट कर पहुँचे थे।

रटने में नेताजी का बालपन से ही बड़ा रसूख था और वह रटंत विद्या के बहुत बड़े चैंपियन थे। कमी थी तो बस एक ही। बीच में टोके जाने पर उनका राग बदल जाता था। वे अक्सर इस धारा से उस धारा में चले जाते—राग विहाग के स्थान पर राग खमाज गाने लगते।

अनुरागियों, आज के जलसे में उन्हें स्कूल में पढ़ाने वाले एक मास्साब भी तशरीफ ले आए थे। वह ठीक मेरी बगल में बैठे थे। मास्साब बता रहे थे कि एक बार उन्होंने नेताजी से सात का पहाड़ा पढ़ने को कहा। जब वह पहाड़ा पढ़ रहे थे तभी हेडमास्टर कक्षा में आ गए। लिहाजा कक्षा के सभी छात्र उनके सम्मान में खड़े हो गए। नेताजी को ‘सेवन फिफ्थजा’ पर टेबल रोकनी पड़ी। हेड मास्टर जी की रुचि पढ़ाई से अधिक खेलों में थी, सो वार्षिक खेलकूद में भाग लेकर कैसे देश को आगे ले जाना है, इस संबंध में आवश्यक दिशा-निर्देशों के बाद उन्होंने नेताजी से पुनः टेबल पढ़ने को कहा। रटंत विद्या में माहिर नेताजी गच्चा खा गए और ‘ऐट सिक्सजा फोर्टी टू, ऐट सेवेनजा फोर्टी नाइन, ऐट ऐटजा फिफ्टी सिक्स’ बोल गए।

नेताजी की गलती का ठीकरा मुझ निरीह मास्टर के सिर फूटा, फलतः मेरा एक इंक्रीमेंट रोक दिया गया। नेताजी की तरक्की के हवन कुंड में मेरे इंक्रीमेंट के होम करने से क्या सुधार हुआ है, यही देखने का लोभ मुझे यहाँ खींच लाया है। मास्साब बोले जा रहे थे, अब तो नेताजी पककर परिपक्व हो गए होंगे। उन्हें देश की जनता ने कई बार हरवाकर नाकों चने चबवाकर जरूर अनुभवी बना दिया होगा। अब उनसे ऐसी गलती नहीं होगी। इसी उम्मीद से यहाँ आया हूँ।

इसी बीच सभा में हलचल तेज हुई, लोगों में धक्का-मुक्की मच गई। हर कोई एड़ी उठाकर अपने कमजोर पंजों के बल खड़ा होकर मंच पर पहुँच रहे नेताजी के दुर्लभ दर्शन प्राप्त कर लेना चाहता था। सभा संचालक अत्यधिक उत्साहित और उत्तेजित होता जा रहा था। आज वह भोजन के स्थान पर फाइटर जेट में भरा जाने वाला ईंधन पी कर आया जान पड़ता था। जैसे-जैसे नेताजी मंच के करीब पहुँच रहे थे, वह उनका नजदीक से सानिध्य प्राप्त करने की गर्मी से आंदोलित हुआ जा रहा था। उसकी आवाज में ओज और वीर रस के कवि के सभी गुण समाहित हो चुके थे। वह माइक की फ्रीक्वेंसी का ख्याल किए बिना जोर-जोर से चिल्लाने लगा—"देश का नेता कैसा हो?" और लोग "नेताजी के जैसा हो!" कहकर नारा पूरा कर रहे थे।

नेताजी अपने दोनों हाथ हवा में पब्लिक की ओर इस तरह लहरा रहे थे, मानो कह रहे हों कि तुमसे किए वादे पूरे करने नहीं आया हूँ। चेहरे पर मुस्कुराहट ऐसी, जैसे कोई ठगकुमार ठग युद्ध जीतने के बाद मुस्कुराता होगा। उनके बैठ जाने के जादुई इशारे का असर कुछ यूँ हुआ कि लोग यह देखे बिना बैठने लगे कि वह अपनी ही कुर्सी पर बैठ रहे हैं या उनकी कुर्सी पर बैठ चुके किसी अन्य की गोद में। परिणामस्वरूप कहासुनी का शोर मच गया। नेताजी लगातार मुस्कुराए जा रहे थे, मानो उन्हें छू लेने की चाहत में यह शोर-शराबा हो रहा हो।

संचालक हदें लाँघता बोले जा रहा था—"आज छै माह हुए जब नेताजी अपने क्षेत्र के प्यारे भाइयों और प्यारी महिलाओं से नहीं मिले। तो इसी तारतम्य में वे आज पिछले छै माह के बीते त्योहारों की बधाई का लेखा-जोखा अपनी प्यारी और सुंदर जनता से कर लेना चाहते हैं।"

नेताजी की वानरी सेना, जिसने सभी तरह के हथकंडे—जैसे बूथ कैप्चरिंग और फर्जी वोट—से उनके गले में विजयश्री की जो माला पहनाई है, वे सामने की पंक्ति में साधिकार विराजमान हैं। मंच संचालक द्वारा आवश्यक औपचारिकताओं के मध्य नेताजी अपनी वानरी सेना को और सेना उन्हें भावविह्वल हो निहार रही थी, मानो आँखों ही आँखों में एक-दूसरे से कह रहे हों—"कब के बिछड़े हुए हम आज कहाँ आ के मिले।"

आज नेताजी को नारी सशक्तिकरण पर बोलना है, वही रटे हुए पहाड़े वाली उनकी बचपन की कला। मास्साब सशंकित हो रहे थे और अपने भगवान से मनाए जा रहे थे कि नेताजी के बोलने में विघ्न-बाधा न आए। बीच में टोके नहीं गए तो सात का, टोके गए तो आठ वाले टेबल में सात वाले का परिणाम आ जाएगा।

उनकी वानरी सेना से नैना भिराम वाली दृश्यावली के मध्य अचानक संचालक ने नेताजी को मंच पर उद्बोधन हेतु आमंत्रित कर ही दिया। नेताजी पूर्ण आत्मविश्वास से खड़े हुए, मंचासीन अपने दाएँ-बाएँ बैठे लोगों को निहारा और पहुँच गए डायस पर। गला साफ करके माइक पर फूंक मारी, जैसे वह मर गया हो और वे उसमें जान डाल रहे हों।

"प्यारे भाइयों और बहनों..." के औपचारिक संबोधन के बाद उन्होंने बोलना प्रारंभ किया—"आज मुझे आप लोगों के मध्य नारी सशक्तिकरण पर बोलने हेतु बुलाया गया है, जो बहुत ही गंभीर और गर्व का विषय है।"

सभा में उपस्थित लोगों की करतल ध्वनि ने नेताजी को डिस्टर्ब किया। जो नहीं होना चाहिए था, वह हो गया—वही आठ का पहाड़ा और सात का परिणाम वाली बात। उन्होंने फिर शुरू किया—

"नारी सशक्त होगी जब पुरुष अशक्त होगा। और पुरुष अशक्त क्यों होना चाहेगा? वह नारी का दमन करेगा, तभी तो स्वच्छंद आचरण के बल पर राजनीति में आगे आएगा। नारी की तरक्की के लिए पुरुष अपनी स्वच्छंदता कैसे छोड़ दे और क्यों छोड़ दे?

इस देश की धार्मिक परंपरा रही है कि नारी शक्ति स्वरूपा दुर्गा, लक्ष्मी, पार्वती और सीता का सम्मान हम उनकी मूर्तियों को मंदिर में रखकर करते आ रहे हैं। तो क्या हम ऐसी मूर्तियों की प्रतिरूपा स्त्री को संघर्ष के लिए सड़कों पर आने दें? क्या यह उचित होगा? मैं समझता हूँ, कदापि नहीं।

उन्हें तो मंदिरों में ही होना चाहिए। मंदिरों की प्रसिद्धि से चढ़ावा अधिक आएगा, जिससे हमें और अधिक नए मंदिर बनाने की दिशा में कार्य करने की प्रेरणा मिलेगी। जिससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। मसलन फूल-माला की दुकानें, नारियल-बताशे-रेवड़ियों और झाँझ-मंजीरों के रोजगार के नए-नए अवसर बनेंगे। और इस तरह देश की गरीबी भागेगी।"

भाषण के मध्य नेताजी के मोबाइल ने खलल डाला, उस पर उन्होंने क्षण भर बात की तो वह आठ का पहाड़ा भूल गए। दोबारा जब बोलना शुरू किया तो सीधे बारहखड़ी पर पहुँच गए। वे बोलते गए—

"सभा में उपस्थित सभी श्रद्धालु भाइयों को उनके द्वारा किए गए करवा चौथ की शुभकामनाएँ। भाइयों ने जिस विश्वास से जो राखी बहनों की कलाई पर पिछले दिनों बाँधी है, लिहाजा बहनें उस विश्वास पर खरी उतरें और भाइयों की रक्षा करें।"

(उन पर मुकदमों का आसन्न संकट देखते हुए यह आवश्यक भी हो जाता है।)

"बीती होली की शुभकामनाएँ देता हूँ। यह त्योहार पहले जैसे सद्भाव से नहीं मनाया जाता, लिहाजा भाइयों से गुजारिश है कि वे घरों में रहकर ही लजीज व्यंजन बनाएँ और त्योहार का आनंद लें। बाहर निकलने पर खतरा अधिक है—बहनें आक्रामक हो गई हैं। अब वातावरण बदल रहा है, जरा सी चूक पर आपका मुँह काला हो सकता है। रंगों के स्थान पर कालिख से होली खेले जाने से यह खतरा और भी बढ़ गया है। पानी की कमी है, लिहाजा कई दिनों तक चेहरे की कालिख समाज में नुमाया हो सकती है।"

नेताजी ये क्या अनाप-शनाप बोले जा रहे हैं, यह ध्यान दिलाने के लिए उनका निज सहायक उनके कान में आकर कुछ बोल गया। नेताजी फिर भटका दिए गए थे। उन्हें लगा, वह अच्छा-भला तो बोल रहे थे। रटा हुआ बोलने में तो उनका कभी कोई सानी रहा ही नहीं।

अब वे राग मालकोस के स्थान पर राग मल्हार गाने लगे थे। जिस पर पब्लिक के ठहाकों और तालियों ने उन्हें वीर रस के ओज से भर दिया था। वातावरण में सोने पर सुहागा तो होना ही था। नेताजी ने आगे भी बोलना जारी रखा—

"उन्हें जिम जाना होगा, वहाँ से पुरुषों को भगाना होगा। पुलिस में भर्ती होकर छिछोरों को कानून का पाठ पढ़ाना होगा। संसद में और अधिक संख्या में पहुँचकर संसद चलने से रोकने वाले हम जैसे गुंडे नेताओं से ज़्यादा संसदीय कार्य में व्यवधान करने का शानदार प्रदर्शन करना होगा। जिससे दुनिया में हमारी लोकतांत्रिक संसदीय परंपरा का नाम और यश नुमाया हो।"

तभी सभा में जोरदार आवाज उठी—"नेताजी, तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं।"

जिससे अभिभूत हो नेताजी और जोश से भर उठे। तभी उनके कान में बोलने के लिए पुनः उनका निज सहायक आया। नेताजी ने अपने जोरदार भाषण में अवरोध उत्पन्न करने वाले को जोर का झटका दिया। उनका निज सहायक उछलकर सभा के मध्य जा गिरा।

नेताजी के भाषण से उत्साहित महिलाओं ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया। उनसे छूटने की जी-तोड़ कोशिश में वह अपने कपड़े फड़वा बैठा। नेताजी बोले जा रहे थे—"देशद्रोहियों को सबक सिखाने के लिए बहनों को आगे आना होगा।"

बाकी का काम नेताजी की प्रेरणा से बहनों ने स्वतः कर दिया। नेताजी पर भी जूते-चप्पल पड़ रहे थे। दरअसल यह तब हुआ जब एक महिला सभा स्थल पर पहुँच गई, जिसके साथ उन नेताजी ने छल से दुराचार किया था। पुलिस के पास नेताजी के विरुद्ध पक्के सबूत थे, परंतु कानून कुछ कर नहीं पा रहा था, सो यह काम आम जनता ने कर डाला। नेताजी के ओजपूर्ण भाषण ने ही उन्हें भस्मासुर बना दिया।

सभा में मची भगदड़ के बाद आम की ठंडी छाँव में बैठे मास्साब दुखी थे। उनके दुख का कारण जानने मैं उनके पास पहुँचा। वे पछता रहे थे—"उनका ऐसा गधा छात्र राजनीति में आया, जिसे मैं पहाड़ा रटकर नहीं, समझ कर सीखने का पाठ नहीं पढ़ा सका।"

मैंने मास्साब से कहा—"आप क्यों दुखी हैं? यही तो नारी शक्ति का वास्तविक स्वरूप है। नेताजी ने आज नारी शक्ति पर विचार रखने का जो प्रयोग किया, उसका परिणाम उन्हें स्वयं पर ही भोगना पड़ा। यह कोई रट्टा नहीं, यह तो अनुभव था।"

मास्साब ने सिर हिलाया और बोले—"बेटा, यही तो दुख है। जो नहीं पढ़ा सका, वही आज जनता ने पढ़ा दिया। अब समझ में आया, असली नारी शक्ति का पाठ सड़क पर पढ़ाया जाता है, कक्षा में नहीं।"

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