भारतीय ज्ञान परम्परा: जैन दर्शन, वेद और नास्तिकवाद

भारतीय ज्ञान परम्परा: जैन दर्शन, वेद और नास्तिकवाद का अंतर्संबंध

ह संबंध बहुत गहरा और दिलचस्प है। भारतीय ज्ञान परंपरा में 'आस्तिक' और 'नास्तिक' की परिभाषा पश्चिमी दर्शन या आम बोलचाल (ईश्वर को मानना या न मानना) से काफी अलग है।


यहाँ सनातन (वैदिक) परंपरा और जैन दर्शन के संदर्भ में इन तीनों के संबंधों का विस्तृत विश्लेषण दिया गया है:

1. भारतीय दर्शन में 'आस्तिक' और 'नास्तिक' की परिभाषा

सामान्यतः लोग समझते हैं कि जो भगवान को माने वो आस्तिक और जो न माने वो नास्तिक। लेकिन भारतीय दर्शन शास्त्र (Shastras) के अनुसार:

आस्तिक (Orthodox): जो वेदों की प्रामाणिकता (Authority of Vedas) को स्वीकार करते हैं। (जैसे: न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदांत)।

नास्तिक (Heterodox): जो वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार नहीं करते।

पाणिनि व्याकरण के अनुसार: "अस्ति नास्ति दिष्टं मतिः" अर्थात जो परलोक और वेदों को प्रमाण नहीं मानता, वह नास्तिक है। इस परिभाषा के तहत जैन दर्शन, बौद्ध दर्शन और चार्वाक दर्शन को 'नास्तिक दर्शन' की श्रेणी में रखा गया है।

2. जैन दर्शन और वेद: विरोध के मुख्य बिंदु

जैन दर्शन एक स्वतंत्र और अत्यंत प्राचीन दर्शन है। वेदों के साथ इसका संबंध मुख्य रूप से अस्वीकार्यता और तार्किक विरोध का रहा है। जैन दर्शन वेदों को अपौरुषेय (ईश्वर द्वारा रचित या नित्य) नहीं मानता। इसके विरोध के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

वेद पौरुषेय हैं (मानव निर्मित): जैन विद्वानों का तर्क है कि वेद किसी सर्वशक्तिमान ईश्वर की रचना नहीं हैं, बल्कि वे मनुष्यों (ऋषियों) द्वारा लिखे गए हैं। इसलिए उनमें मानवीय गलतियाँ, विरोधाभास और पक्षपात होना स्वाभाविक है।

पशु बलि और यज्ञ का विरोध: वैदिक काल के उत्तरार्ध में यज्ञों में बड़े पैमाने पर पशु बलि दी जाने लगी थी। जैन दर्शन का मूल स्तंभ 'अहिंसा परमो धर्मः' (पूर्ण अहिंसा) है। जैनियों ने वेदों में वर्णित इस हिंसा का कड़ा विरोध किया और इसे अधर्म बताया।

सृष्टिकर्ता ईश्वर का खंडन: वेद और उपनिषद एक ऐसी परम सत्ता (ब्रह्म या ईश्वर) की बात करते हैं जिसने इस सृष्टि को बनाया है। इसके विपरीत, जैन दर्शन कहता है कि यह ब्रह्मांड शाश्वत (Eternal) है—इसका न तो कोई आदि (शुरुआत) है और न कोई अंत। इसे किसी ईश्वर ने नहीं बनाया।

जाति व्यवस्था का विरोध: वैदिक समाज में जन्म के आधार पर जो वर्ण व्यवस्था सुदृढ़ हो रही थी, जैन तीर्थंकरों (विशेषकर भगवान महावीर) ने उसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति अपने कर्मों से महान या नीच बनता है, जन्म से नहीं।

3. जैन दर्शन और नास्तिक वाद का संबंध (क्या जैन दर्शन पूरी तरह नास्तिक है?)

दार्शनिक वर्गीकरण में जैन धर्म को 'नास्तिक' कहा गया है, लेकिन इसे 'नास्तिक' कहना केवल वेदों को न मानने तक सीमित है। नास्तिक परंपरा में जैन धर्म के साथ चार्वाक (भौतिकवाद) और बौद्ध दर्शन भी आते हैं।लेकिन जैन दर्शन इन दोनों से बहुत अलग और संतुलित मार्ग अपनाता है। चार्वाक ने नैतिक मूल्यों को पूरी तरह नकारा जबकि, जैन दर्शन ने नैतिक मूल्यों को व्यावहारिक एवं जीवन जीने की शैली के रूप में स्वीकारा। जैन दर्शन ने भौतिक सुखों के स्थान पर अपरिग्रह (non-possessiveness) और स्याद्वाद (अनेकांतवाद - relativity of truth) का मार्ग दिया। आध्यात्मिक और नैतिक दृष्टिकोण से जैन दर्शन नास्तिक बिल्कुल नहीं है। इसे समझने के लिए इसके दो पहलुओं को देखना होगा:

जहाँ जैन दर्शन 'नास्तिक' (निरीश्वरवादी) है:

जैन दर्शन सृष्टिकर्ता ईश्वर (Creator God) को नहीं मानता। उनके अनुसार कोई ऐसा भगवान नहीं है जो बैठकर हमारे भाग्य लिख रहा हो, हमें दंड दे रहा हो या पुरस्कार दे रहा हो। हर जीव अपने कर्मों के लिए स्वयं जिम्मेदार है।

जहाँ जैन दर्शन पूर्णतः 'आस्तिक' (अध्यात्मवादी) है:

यदि आस्तिक का अर्थ आत्मा, परलोक और मोक्ष में विश्वास से है, तो जैन दर्शन से बड़ा आस्तिक कोई नहीं है:

आत्मा की सत्ता (Soul): जैन दर्शन प्रत्येक जीव में एक स्वतंत्र और अमर आत्मा (जीव) को स्वीकार करता है।

पुनर्जन्म और कर्म सिद्धांत: यह मानता है कि आत्मा अपने कर्मों के अनुसार बार-बार जन्म लेती है।

मोक्ष (Liberation): कर्मों के बंधन को पूरी तरह काट देना ही मोक्ष (सिद्ध शिला प्राप्त करना) है।

अहिंसा का सिद्धांत: वैदिक युग के कुछ यज्ञों में होने वाली पशुबलि के विपरीत, जैन दर्शन ने 'अहिंसा परमो धर्मः' को अपने केंद्र में रखा। सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव की रक्षा भी इसका मूल आधार बनी।

कर्म का नियम बनाम ईश्वर की कृपा: वैदिक विचारधारा जहाँ प्रार्थना और यज्ञों के माध्यम से देवताओं को प्रसन्न करने पर बल देती है, वहीं जैन दर्शन स्पष्ट रूप से कहता है कि ब्रह्मांड को चलाने वाला या आपके भाग्य को लिखने वाला कोई ईश्वर नहीं है। व्यक्ति अपने कर्मों का फल स्वयं भोगता है और अपने प्रयासों से ही मोक्ष (निर्वाण) प्राप्त कर सकता है।

स्याद्वाद (अनेकांतवाद) और वैचारिक समन्वय:

जैन दर्शन की भारतीय चिंतन को सबसे बड़ी देन है अनेकांतवाद। इसके अनुसार, सत्य के कई पहलू होते हैं (जैसे हाथी और अंधे व्यक्तियों की कहानी)।

इस दृष्टिकोण ने वेदों और नास्तिकवाद के बीच एक पुल का काम किया:

"वैदिक दर्शन अगर सत्य के एक पहलू (जैसे- ब्रह्म की नित्यता) को देख रहा है, और चार्वाक या बौद्ध दूसरे पहलू (परिवर्तनशीलता या भौतिकता) को देख रहे हैं, तो जैन दर्शन कहता है कि दोनों अपनी-अपनी जगह आंशिक रूप से सही हो सकते हैं, बशर्ते वे दूसरे के विचार को पूरी तरह खारिज न करें।"

तीर्थंकरों की पूजा: जैन ईश्वर को सृष्टिकर्ता नहीं मानते, लेकिन वे उन 'मुक्त आत्माओं' (तीर्थंकरों) की पूजा करते हैं जिन्होंने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है (जिन्हें 'जिन' कहा जाता है)। वे ही उनके लिए भगवान हैं।

4. वेदों में जैन दर्शन के संकेत (ऐतिहासिक संबंध)

भले ही जैन दर्शन वेदों को प्रमाण नहीं मानता, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि हिंदू धर्म के सबसे प्राचीन ग्रंथ 'ऋग्वेद' में जैन तीर्थंकरों का उल्लेख मिलता है। इससे सिद्ध होता है कि दोनों परंपराएं समानांतर रूप से प्राचीन काल से सह-अस्तित्व में थीं:

ऋग्वेद में जैन धर्म के पहले तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (मरुदेवी के पुत्र) का नाम आदरपूर्वक लिया गया है। उन्हें 'वातरशना' (दिगंबर मुनि) के रूप में वर्णित किया गया है।

ऋग्वेद के अलावा श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण में भी ऋषभदेव को भगवान विष्णु के २४ अवतारों में से एक (८वां अवतार) माना गया है।

२२वें तीर्थंकर नेमिनाथ को भगवान श्रीकृष्ण का चचेरा भाई माना जाता है, जिनका वर्णन भी उत्तर-वैदिक साहित्य में मिलता है।

निष्कर्ष 

संक्षेप में कहें तो, जैन दर्शन 'वेद विरोधी' होने के कारण नास्तिक (Heterodox) कहलाता है, लेकिन नास्तिक (Atheist) नहीं है क्योंकि यह आत्मा, पुनर्जन्म, नैतिक आचरण और मोक्ष की सत्ता में पूर्ण विश्वास रखता है। यह भारतीय संस्कृति की 'श्रमण परंपरा' का प्रतिनिधित्व करता है, जिसने वैदिक कर्मकांड के खिलाफ एक बौद्धिक और नैतिक क्रांति की थी। इस प्रकार, जैन दर्शन ने वेदों के कर्मकांड का विरोध तो किया, लेकिन उपनिषदों के 'आत्म-ज्ञान' और 'तप' के विचार को एक नए, व्यावहारिक और तार्किक रूप में समाज के सामने रखा। यह वेदों के एकाधिकार को चुनौती देने वाला 'नास्तिक' (अवैदिक) मार्ग था, लेकिन आध्यात्मिक गहराई में यह किसी भी आस्तिक दर्शन के समकक्ष या उससे भी अधिक गंभीर था।

🖊️डॉ मुकेश जैन, भोपाल.🙏

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