जैन दर्शन में समवशरण की रचना

  जैन दर्शन में समवशरण की रचना

जैन दर्शन में समवशरण तीर्थंकर  प्रभु की दिव्य और अलौकिक धर्मसभा को कहा जाता है। जब किसी तीर्थंकर को केवलज्ञान (परम ज्ञान) की प्राप्ति होती है, तब उनके उपदेश (दिव्यध्वनि) के लिए कुबेर द्वारा देवों की सहायता से इस भव्य सभा की रचना की जाती है। यह एक ऐसी लोक-कल्याणकारी रचना है जहाँ मनुष्य, देव और पशु-पक्षी सभी एक साथ बैठकर बिना किसी बैर-भाव के प्रभु की देशना सुनते हैं।

यहाँ समवशरण की रचना और उसकी प्रमुख विशेषताओं को विस्तार से समझा गया है:

समवशरण की रचना कब और कैसे होती है?

रचना का समय: जब तीर्थंकर प्रकृति का जीव दीक्षा लेने के बाद कठोर तपस्या करते हैं और चार घातीय कर्मों का नाश करके केवलज्ञान प्राप्त करते हैं, उसी क्षण देवराज इंद्र की आज्ञा से धनपति कुबेर समवशरण की रचना करते हैं।

भूमि से ऊपर निर्माण: यह पूरी रचना पृथ्वी से अधर (आकाश में) होती है। मान्यता के अनुसार यह जमीन से 5000 धनुष (लगभग कई किलोमीटर) ऊपर आकाश में अंतरिक्ष में निर्मित होती है, जहाँ पहुँचने के लिए चारों दिशाओं में 20,000 सीढ़ियाँ होती हैं। (परंतु केवलज्ञान के अतिशय से वृद्ध, बालक और अपंग व्यक्ति भी इन्हें बिना थके पलक झपकते पार कर लेते हैं)।

आकृति: समवशरण आमतौर पर गोलाकार (वृत्ताकार) होता है, जिसमें आठ कोट (प्राकार या दीवारें) और बारह सभाएँ (कोष्ठक) होती हैं।

समवशरण की मुख्य विशेषताएं

समवशरण केवल एक सभा नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की सबसे सुंदर और पवित्र संरचना मानी जाती है। इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

1. बारह सभाएं (Twelve Compartments)

समवशरण के भीतर १२ अलग-अलग कक्ष या कोष्ठक होते हैं, जिनमें बैठकर सभी जीव उपदेश सुनते हैं। इसमें किसी के साथ भेदभाव नहीं होता:

ऋषि-मुनि (साधु): पहले कोष्ठक में गणधर और मुनिराज बैठते हैं।

कल्पवासी देवियाँ, आर्यिकाएं और श्राविकाएं (महिलाएं): इनके लिए अलग कोष्ठक होते हैं।

भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिष और कल्पवासी देव: विभिन्न देवों के लिए अलग-अलग स्थान।

मनुष्य (श्रावक): चक्रवर्ती, राजा और सामान्य मनुष्यों के लिए स्थान।

तिर्यंच (पशु-पक्षी): सबसे अनोखी बात यह है कि यहाँ शेर, गाय, हिरण, सर्प और मोर जैसे परस्पर विरोधी स्वभाव वाले पशु-पक्षी भी एक साथ बैठकर शांत भाव से उपदेश सुनते हैं।

2. गंधकुटी और तीर्थंकर का सिंहासन

समवशरण के बिल्कुल केंद्र में एक अत्यंत सुगंधित और देदीप्यमान मंच होता है जिसे गंधकुटी कहते हैं।

इस गंधकुटी के बीच में एक रत्नजड़ित सिंहासन होता है, जिससे ४ अंगुल ऊपर अंतरिक्ष में तीर्थंकर भगवान विराजमान होते हैं (वे सिंहासन को स्पर्श नहीं करते)।

चतुर्मुख रूप: भगवान का मुख केवल एक दिशा में होता है, लेकिन केवलज्ञान के अतिशय के कारण चारों दिशाओं में बैठे जीवों को यही दिखाई देता है कि भगवान उन्हीं की तरफ मुख करके बैठे हैं।

3. अशोक वृक्ष और अष्ट प्रातिहार्य

भगवान के सिर के पीछे भामंडल (आभामंडल) चमकता है जिसमें जीव को अपने पिछले तीन और अगले तीन भव दिखाई देते हैं। भगवान के ऊपर देवों द्वारा विशाल अशोक वृक्ष की रचना की जाती है, तीन छत्र लगाए जाते हैं, और देवता चामर ढोरते हैं।

4. दिव्यध्वनि (Universal Discourse)

तीर्थंकर प्रभु जब उपदेश देते हैं, तो उनके होठ नहीं हिलते। उनकी नाभि से एक अत्यंत मधुर और गूंजती हुई दिव्यध्वनि (अक्षर रहित वाणी) खिरती है।

यह ध्वनि 'ॐ' कार रूप होती है।

5. समस्त भाषा अनुवादिनी: इस ध्वनि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वहाँ उपस्थित मनुष्य, देव और पशु-पक्षी, सभी इसे अपनी-अपनी भाषा और समझ के अनुसार समझ लेते हैं।

6. शांति और समता का वातावरण: समवशरण की सीमा में प्रवेश करते ही सभी जीवों के मन से आपसी वैर, क्रोध, भूख-प्यास और भय पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं। वहाँ जन्मजात शत्रु (जैसे: शेर और हिरण, सांप और नेवला) भी मित्र की तरह व्यवहार करते हैं।

समवशरण के आठ प्राकार (दीवारें)

समवशरण की भव्य गोलाकार रचना आठ कोटों (दीवारों) से घिरी होती है। ये केवल सुरक्षा दीवारें नहीं हैं, बल्कि रत्नजड़ित, अत्यंत सुंदर और आध्यात्मिक महत्व रखने वाली रचनाएँ हैं। पृथ्वी से ऊपर उठने पर क्रमबद्ध तरीके से ये आठ प्राकार इस प्रकार आते हैं:

 1. धूलिसाल प्राकार (पहला कोट): यह समवशरण की सबसे बाहरी दीवार होती है। यह अनेक रंगों के रत्नों के चूर्ण (धूलि) से निर्मित होती है, इसलिए इसे 'धूलिसाल' कहते हैं। इसकी चमक अत्यंत दिव्य होती है।

 2. कांचन प्राकार (दूसरा कोट): यह प्राकार पूरी तरह शुद्ध सोने (स्वर्ण) से बना होता है। इसकी आभा सूर्य के समान देदीप्यमान होती है।

 3. चित्र प्राकार (तीसरा कोट): इस दीवार पर अद्भुत और सजीव चित्रकारी होती है। इसमें तीर्थंकर भगवंतों के पूर्व भवों की कथाएँ, देवलोक के दृश्य और जैन दर्शन के सिद्धांतों को चित्रों के माध्यम से दर्शाया जाता है।

 4. हेम प्राकार (चौथा कोट): यह भी स्वर्णमयी प्राकार है, लेकिन इसकी बनावट और इस पर की गई नक्काशी दूसरे प्राकार से भिन्न और अधिक सूक्ष्म होती है।

 5. रजत प्राकार (पांचवां कोट): यह प्राकार पूर्णतः चांदी (रजत) से निर्मित होता है। इसकी धवलता और शीतलता मन को अत्यंत शांत करती है।

 6. शब्द प्राकार (छठा कोट): इस प्राकार की विशेषता यह है कि जब हवा चलती है या जीव इसके पास से गुजरते हैं, तो इसमें से अत्यंत मधुर संगीतमय ध्वनियां और जिन-गुणानुवाद (प्रभु की स्तुति) के स्वर स्वतः ही गुंजायमान होते हैं।

 7. विमल प्राकार (सातवां कोट): यह प्राकार स्फटिक मणि के समान बिल्कुल पारदर्शी और स्वच्छ (विमल) होता है। इसमें किसी भी प्रकार की मलिनता नहीं होती।

 8. रत्न प्राकार (आठवां कोट): यह सबसे अंतिम और आंतरिक प्राकार है, जो अनेक प्रकार के बहुमूल्य रत्नों (जैसे नीलम, पुखराज, हीरा, पन्ना) से जड़ा होता है। इसी प्राकार के भीतर मुख्य गंधकुटी और बारह सभाएँ होती हैं, जहाँ भगवान विराजमान होते हैं।

'मानस्तंभ': अहंकार को चूर करने वाला वैभव

समवशरण के चारों मुख्य द्वारों (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण) के बाहर, धूलिसाल प्राकार से पहले एक-एक अत्यंत ऊँचा और भव्य स्तंभ होता है, जिसे 'मानस्तंभ' कहा जाता है। यह समवशरण का एक मुख्य आकर्षण और अतिशय है।


बनावट: यह स्तंभ सोने, चांदी और अनेक रत्नों से बना होता है। इसके सबसे ऊपरी भाग पर चारों दिशाओं में तीर्थंकर भगवान की चार सुंदर प्रतिमाएँ (जिनबिंब) विराजमान होती हैं।

आध्यात्मिक महत्व: इसका नाम 'मान-स्तंभ' (मान अर्थात् अहंकार) इसलिए है क्योंकि समवशरण की ओर आने वाले बड़े से बड़े चक्रवर्ती सम्राट, राजा या देवों का अहंकार इस स्तंभ को देखते ही स्वतः ही समाप्त हो जाता है।

अहंकार मुक्ति का अतिशय: जब तक जीव के भीतर 'मैं' या 'मेरा' का अहंकार होता है, वह प्रभु की दिव्य देशना को आत्मसात नहीं कर सकता। मानस्तंभ को देखते ही जीव का मन अत्यंत विनम्र और कोमल हो जाता है, और वह पूरी तरह से निष्कपट होकर धर्मसभा में प्रवेश करता है।

इन आठ प्राकारों और मानस्तंभ को पार करने के बाद ही कोई भी जीव उस अलौकिक गंधकुटी तक पहुँचता है, जहाँ तीर्थंकर प्रभु की समतामयी वाणी का अमृत बरस रहा होता है।

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