जंबूद्वीप

 जंबूद्वीप की रचना 

जैन भूगोल (Jain Cosmology) में जंबूद्वीप (Jambudwipa) की रचना अत्यंत अनूठी, विस्तृत और गणितीय सटीकता पर आधारित है। जैन मान्यताओं के अनुसार, मध्यलोक के ठीक केंद्र में स्थित सबसे पहला और मुख्य द्वीप जंबूद्वीप है। इसका नाम यहाँ स्थित एक विशाल अनादि 'जंबू' (जामुन) वृक्ष के कारण पड़ा है। जैन दर्शन में जम्बूद्वीप मध्य लोक (Madhya-loka) का सबसे भीतरी और केंद्रीय महाद्वीप है। इसे मानव लोक (Manuṣya-loka) भी कहा जाता है, क्योंकि यहीं मनुष्य निवास करते हैं और तीर्थंकरों का जन्म होता है। इसकी प्रमुख रचना विशेषताएँ इस प्रकार हैं: 


नीचे पारंपरिक जैन मानचित्रों के आधार पर जंबूद्वीप की बनावट को समझाया गया है:

1. आकार और सीमा

थाली जैसा आकार: जंबूद्वीप पूरी तरह गोल (वृत्ताकार) है,  जम्बूद्वीप थाली के समान गोल (वृत्ताकार) है।

व्यास: इसका व्यास 1 लाख योजन (जैन दूरी की एक बड़ी इकाई- लगभग 9,00,000 मील) है।

स्थिति: यह मध्य लोक के केंद्र में स्थित है तथा संकेंद्रित वलयों में बने द्वीपों और समुद्रों की श्रृंखला का पहला द्वीप है।

लवण समुद्र से घिरा: इसके चारों ओर चूड़ी के आकार में लवण समुद्र (खारे पानी का समुद्र) फैला हुआ है, जो इसके आकार से दोगुना यानी 2 लाख योजन चौड़ा है।

2. सुमेरु पर्वत (केंद्र बिंदु)

जंबूद्वीप के ठीक बीचों-बीच सुमेरु पर्वत (या मंदार पर्वत) स्थित है। यह मध्यलोक का सबसे ऊँचा बिंदु माना जाता है। जैन भूगोल में दिशाओं और क्षेत्रों का निर्धारण इसी सुमेरु पर्वत को केंद्र मानकर किया जाता है। यह पर्वत 1 लाख योजन ऊँचा है।

3. 7- अलग-अलग भू-भाग

सुमेरु पर्वत के उत्तर और दक्षिण में पूर्व से पश्चिम की ओर फैली 6 बड़ी पर्वत श्रृंखलाएं (कुलाचल) हैं। इन पर्वतों के कारण जंबूद्वीप 7 अलग-अलग भू-भागों या क्षेत्रों में बंट जाता है:

 1. भरत क्षेत्र: यह सबसे दक्षिण में स्थित है। हम (मनुष्य) इसी भरत क्षेत्र के 'आर्यखंड' में निवास करते हैं। यह कर्मभूमि है।

 2. ऐरावत क्षेत्र: यह सबसे उत्तर में स्थित है। इसकी बनावट और व्यवस्था काफी हद तक भरत क्षेत्र जैसी ही है।

 3. महाविदेह क्षेत्र: यह सुमेरु पर्वत के पूर्व और पश्चिम में फैला सबसे बड़ा क्षेत्र है। यहाँ हमेशा चतुर्थ काल (दुषम-सुषम काल) जैसी स्थिति रहती है और वर्तमान में भी यहाँ तीर्थंकर (जैसे सीमंधर स्वामी) साक्षात मौजूद हैं।

 4. चार-हैमवत क्षेत्र, हरिवर्ष क्षेत्र, रम्यक क्षेत्र, और हैरण्यवत क्षेत्र: ये चारों भोगभूमियाँ हैं, जहाँ कल्पवृक्षों से जीवन चलता है और लोग बिना किसी कठिन परिश्रम के सुखद जीवन जीते हैं।

इन 7 क्षेत्रों को आपस में बांटने वाले  विशाल सोने-चांदी और मणियों से बने 6-कुलाचल (सीमा निर्धारक) पर्वत हैं:

  1. हिमवान, 
  2. महाहिमवान, 
  3. निषध, 
  4. नील, 
  5. रुक्मी और 
  6. शिखरी।

इन पर्वतों के ऊपर विशाल सरोवर (तालाब) बने हैं, जहाँ से पवित्र नदियाँ निकलती हैं।

5. मुख्य नदियाँ

प्रत्येक सरोवर से दो मुख्य नदियाँ विपरीत दिशाओं में निकलती हैं, जिससे जंबूद्वीप में कुल 14 मुख्य नदियाँ बहती हैं। उदाहरण के लिए, भरत क्षेत्र को सींचने वाली दो महान नदियाँ गंगा और सिंधु हैं, जो हिमवान पर्वत के 'पद्म सरोवर' से निकलती हैं।

6. चार द्वार (गोपुर)

जम्बूद्वीप की परिधि (जगती) पर चारों दिशाओं में चार विशाल द्वार हैं:

  •  पूर्व में विजय
  •  दक्षिण में वैजयंत
  •  पश्चिम में जयंत
  •  उत्तर में अपराजित

  ये द्वार 8 योजन ऊँचे और 4 योजन चौड़े हैं।

विशेष बात: जैन दर्शन के अनुसार जंबूद्वीप, धातकीखंड द्वीप और पुष्करार्ध द्वीप को मिलाकर अढ़ाई द्वीप (2.5 द्वीप) बनते हैं। पूरे ब्रह्मांड में केवल इसी अढ़ाई द्वीप के भीतर ही मनुष्यों का जन्म और निवास संभव है। जम्बूद्वीप, विशेष रूप से इसका भरत क्षेत्र और ऐरावत क्षेत्र, कर्म-भूमि हैं। यहाँ रहने वाले मनुष्य आत्म-संयम और तपस्या द्वारा मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। सभी 24 तीर्थंकरों का जन्म इसी जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में होता है।

एक भौतिक प्रतिरूप: हस्तिनापुर का जम्बूद्वीप मंदिर

जैन ब्रह्मांड विज्ञान का एक भव्य प्रतिरूप उत्तर प्रदेश के हस्तिनापुर में स्थित है:

  • इसका निर्माण वर्ष 1972 में आर्यिका ज्ञानमति माताजी द्वारा कराया गया था।
  • यह सफेद और रंगीन संगमरमर से बना है, जिसका व्यास 250 फीट है।
  • इसके केंद्र में 101 फीट ऊँचा सुमेरु पर्वत हल्के गुलाबी संगमरमर से निर्मित है।

जैन दर्शन में जम्बूद्वीप की रचना केवल एक भौगोलिक वर्णन नहीं, बल्कि एक जटिल ब्रह्मांडीय व्यवस्था है, जो आत्मा के संसार से मुक्ति तक के सफर का प्रतीक है।

✡️⚛️🔯

Comments

Popular posts from this blog

01-"अपने विचार, अपना उपचार"

भगवती सूत्र : जैन दर्शन का ज्ञानकोश

यूजीसी नियम 2026 पर विवाद