'आदि पुराण' : द्वितीय पर्व

 'आदि पुराण' : द्वितीय पर्व-भोगभूमि,कल्पवृक्ष एवं मानव सभ्यता का विकास

चार्य जिनसेन स्वामी द्वारा रचित 'आदि पुराण' का द्वितीय पर्व (दूसरा अध्याय) मुख्य रूप से जैन ब्रह्मांड विज्ञान (Cosmology), काल चक्र (Time Cycle) की अवधारणा और आदिनाथ भगवान के पूर्व भव (पिछले जन्म) की पृष्ठभूमि को समर्पित है।

इस पर्व का विस्तार से वर्गीकरण निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है:

१. तीर्थंकर की दिव्यध्वनि और श्रोताओं का आनंद

प्रथम पर्व के अंत में राजा भरत ने जो प्रश्न पूछे थे, इस द्वितीय पर्व के प्रारंभ में भगवान ऋषभदेव की दिव्यध्वनि के माध्यम से उन प्रश्नों के उत्तर मिलने शुरू होते हैं। समवसरण में उपस्थित सभी भव्य जीव (देव, मनुष्य, मुनि) भगवान की प्राकृत और सार्वभौमिक वाणी को सुनकर अत्यंत हर्षित होते हैं। गणधर देव इस उपदेश को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करते हैं।

२. जैन काल-चक्र (Time Cycle) का वर्णन

इस पर्व में जैन दर्शन के अनुसार काल के परिवर्तन का वैज्ञानिक और दार्शनिक विवेचन किया गया है:

उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी: काल चक्र को दो मुख्य भागों में बांटा गया है। 'अवसर्पिणी' (जिसमें सुख, आयु और ऊंचाई घटती है) और 'उत्सर्पिणी' (जिसमें सुख और विकास बढ़ता है)।

छह कालों का विभाजन: आचार्य ने अवसर्पिणी काल के छह भेदों का विस्तार से वर्णन किया है:

  1. सुषमा-सुषमा (अत्यंत सुख का काल)
  2. सुषमा (सुख का काल)
  3. सुषमा-दुषमा (सुख-दुख मिश्रित काल - इसी काल के अंत में तीर्थंकरों का अवतरण होता है)
  4. दुषमा-सुषमा (दुख-सुख मिश्रित काल)
  5. दुषमा (दुख का काल/वर्तमान काल)
  6. दुषमा-दुषमा (अत्यंत दुख का काल)

३. भोगभूमि और कल्पवृक्षों का स्वरूप

द्वितीय पर्व में उस समय की भोगभूमि की स्थिति का सुंदर चित्रण है जब मनुष्यों को कर्म (खेती, व्यापार आदि) नहीं करना पड़ता था।

कल्पवृक्ष: मनुष्यों की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति १० प्रकार के कल्पवृक्षों से होती थी। ये वृक्ष भोजन, वस्त्र, आभूषण, प्रकाश, और संगीत जैसी वस्तुएं स्वतः प्रदान करते थे।

युगलिया जीवन: भोगभूमि के मनुष्य जोड़ों (स्त्री-पुरुष के जोड़े या युगल) के रूप में जन्म लेते थे, उनका जीवन अत्यंत शांत, संतोषी और बिना किसी ईर्ष्या-द्वेष के बीतता था।

४. कर्मभूमि का प्रारंभ और १४ कुलकर (मनु)

जैसे-जैसे काल बदलता है और कल्पवृक्षों की शक्ति कम होने लगती है, मनुष्य व्याकुल होने लगते हैं। तब समाज को व्यवस्था देने के लिए 'कुलकर' (जिन्हें आदि-मनु भी कहा जाता है) उत्पन्न होते हैं।

इस पर्व में १४ कुलकरों के नाम, उनकी आयु और उनके द्वारा समाज को दी गई दंड-नीति (हा, मा, धिक्) का विस्तृत विवरण है। ये कुलकर मनुष्यों को कल्पवृक्षों के घटने पर जीवन जीने की कला, पशुओं से रक्षा और समाज के नियम सिखाते हैं। १४वें कुलकर 'नाभिराय' होते हैं, जो भगवान ऋषभदेव के पिता बनते हैं।

५. भगवान आदिनाथ के प्रथम 'भव' (राजा महाबल) की कथा

पर्व के उत्तरार्ध में मुख्य कथा का बीजारोपण होता है। राजा भरत को उनके पिता (आदिनाथ) के पूर्व जन्मों की यात्रा बताई जाती है:

स्वयंप्रभ नगर के राजा महाबल: आदिनाथ भगवान बहुत पहले के एक जन्म में 'अलकापुरी' या 'स्वयंप्रभ' नगर के अत्यंत प्रतापी और वैभवशाली राजा 'महाबल' थे। वे न्यायप्रिय और शक्तिशाली शासक थे।

चार मंत्रियों का संवाद (दर्शन का प्रारंभ): राजा महाबल की राजसभा में उनके चार प्रसिद्ध मंत्री थे—महामति, संभिन्नमति, शतमति और स्वयंमति।

दार्शनिक चर्चा: इन मंत्रियों के माध्यम से जैन दर्शन और अन्य दर्शनों (जैसे चार्वाक, बौद्ध आदि) की तुलनात्मक चर्चा की गई है। तीन मंत्री राजा को केवल संसार के भोगों में लिप्त रहने की सलाह देते हैं (नास्तिक विचारधारा), जबकि 'स्वयंमति' नाम के सम्यग्दृष्टि मंत्री राजा को धर्म, आत्मा की अमरता और कर्म सिद्धांत का बोध कराते हैं।

निष्कर्ष: आदि पुराण का द्वितीय पर्व केवल एक कहानी नहीं है, बल्कि यह जैन आचार्यों की वैज्ञानिक सोच को दर्शाता है। यह पर्व मानव सभ्यता के विकास (भोगभूमि से कर्मभूमि की ओर संक्रमण) का ऐतिहासिक और दार्शनिक दस्तावेज़ है, जो राजा महाबल के वैराग्य की पृष्ठभूमि के साथ समाप्त होता है।

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