स्वर्ग की तलाश: इंसानी फितरत
स्वर्ग की तलाश में ज़मीन पर भटकता इंसान
मृत्यु के बाद मिलने वाले स्वर्ग के इंतज़ार में इंसान ने पूरी ज़िंदगी एक अंतहीन दौड़ बना ली है। कोई व्रत-उपवास में जुटा है, कोई मंदिरों की लंबी कतारों में खड़ा है, तो कोई महँगे अनुष्ठानों के ज़रिए पुण्य के सिक्के जोड़ने में लगा है। कभी-कभी लगता है कि हमने स्वर्ग को भी कोई आधुनिक हाउसिंग सोसायटी मान लिया है—जहाँ जीवनभर के पुण्य जमा करके एक छोटा-सा फ्लैट बुक कराया जा सकता है।
लेकिन ज़रा ठहरिए और इस विचार को गहराई से महसूस कीजिए…
क्या पता, हम पहले से ही उसी स्वर्ग में जी रहे हैं जिसकी तलाश में सदियों से भटक रहे हैं?
सुबह उठकर अपने चारों तरफ की इस दुनिया पर एक नज़र डालिए। एक स्विच दबाते ही अँधेरा उजाले में बदल जाता है, दूसरा बटन पंखे को जीवंत कर देता है, और तीसरा बटन चिलचिलाती गर्मी में ठंडी हवा का झोंका ले आता है। नल का एक हल्का सा घुमाव पानी की धारा बहा देता है, और गैस का चूल्हा कुछ ही मिनटों में गरमा-गरम खाना परोस देता है। जेब से निकाला गया एक छोटा-सा मोबाइल फोन पूरी दुनिया को आपकी हथेली पर लाकर रख देता है। हज़ारों मील दूर बैठा अपना कोई प्रियजन, बस एक क्लिक पर स्क्रीन पर मुस्कुराता हुआ नज़र आ जाता है।
ये महज़ आधुनिक तकनीक नहीं, चमत्कारों का एक ऐसा संसार है जो दो सदी पहले के सबसे शक्तिशाली सम्राटों के पास भी नहीं था। अगर इतिहास का कोई महान राजा आज आपके आशियाने में कदम रख दे, तो वह अपने विशाल महलों को भूलकर अचंभित रह जाएगा। वह टूटे हुए शब्दों में पूछेगा—
“यह क्या है?” — पलभर में मिलने वाला गर्म पानी!
“और यह?” — बटन दबाते ही बहने वाली ठंडी बयार!
“यह क्या है?” — पूरी कायनात का ज्ञान इस डिब्बे में!
वह शायद कुछ देर सन्नाटे में डूबा रहेगा और फिर एक गहरी साँस लेकर कहेगा— "मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी राजपाट और युद्ध जीतने में खपा दी, लेकिन ऐसी सहूलियतें मुझे कभी नसीब नहीं हुईं।"
फिर भी, आज हम बेचैन हैं। हम क्यों खुश नहीं हैं?
क्योंकि इंसान की फितरत है कि वह जिस सुख का आदी हो जाता है, उसकी कीमत भूल जाता है। एयर कंडीशनर सामान्य रूप से चल रहा हो, तो चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं आती—लेकिन उसके बंद होते ही जीवन मुसीबत बन जाता है। मोबाइल हाथ में हो तो सुकून नहीं मिलता, लेकिन नेटवर्क का एक सिग्नल गायब हो जाए तो लगता है कि दुनिया उजड़ गई है। अपनी गाड़ी है तो तृप्ति नहीं, पड़ोसी की बड़ी कार देखकर सीने में चुभन होती है। अपना घर है, फिर भी किसी और के बंगले की ईर्ष्या चैन छीन लेती है।
हम अपने ही रचे हुए स्वर्ग में खड़े होकर, दूसरों के स्वर्ग से तुलना की आग में खुद को जला रहे हैं।
किंतु इसी धरती पर एक समानांतर दुनिया भी धड़कती है। जहाँ आज भी लाखों लोग पीने के पानी की एक बूँद के लिए घंटों धूप में खड़े रहते हैं। जिनके सिर पर छत नहीं है, जिन्हें यह तक नहीं पता कि रात का खाना नसीब होगा या नहीं। जहाँ बचपन खिलने से पहले ही मज़ूरी की भट्टी में झुलस जाता है। जिन चीज़ों को हम अपनी ज़िंदगी का "बेसिक स्टैंडर्ड" मानकर अनदेखा करते हैं, वे किसी और के लिए ज़िंदगी की सबसे बड़ी दुआ और सपना हैं।
हमें एसी का रिमोट न मिलने पर गुस्सा आता है, और किसी को तपती दोपहरी में पेड़ की छाँव तक नहीं मिलती। हम अपने बढ़ते वजन को लेकर डाइट चार्ट खंगालते हैं, और कोई यह सोचते-सोचते सो जाता है कि कल सुबह का चूल्हा कैसे जलेगा।
यह साफ़ दिखा देता है कि स्वर्ग और नरक कोई मरने के बाद मिलने वाले ठिकाने नहीं हैं। वे यहीं हैं—इसी शहर की सड़कों पर, एक ही घर की अलग-अलग दीवारों के बीच। फर्क परिस्थितियों का नहीं, नज़रिया और दृष्टिकोण का है। कुछ लोग बंजर ज़मीन पर भी उम्मीद के फूल उगा लेते हैं, और कुछ महलों में रहकर भी शिकायतों के ढेर पर बैठे रहते हैं।
मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह हर सुबह यह गिनने बैठता है कि उसके पास क्या नहीं है, पर कभी उन अनगिनत चीज़ों का शुक्रिया अदा नहीं करता जो उसके पास हैं।
आज रात पलंग पर लेटने से पहले सिर्फ पाँच सच्चाइयाँ लिखकर देखिए—
आज मैं आज़ादी से साँस ले पा रहा हूँ।
प्यास बुझाने के लिए मेरे पास साफ़ पानी है।
पेट भरने के लिए अन्न का दाना मौजूद है।
सिर छिपाने के लिए एक सुरक्षित छत है।
मेरे अपने लोग सलामत मेरे साथ हैं।
यह छोटी सी आदत जीवन को देखने का लेंस बदल देगी।
स्वर्ग कोई भूगोल नहीं है, एक अहसास है। और नरक कोई काल्पनिक लोक नहीं, बल्कि जो मिला है उसे भुलाकर हर पल शिकायतों में घुटते रहना ही नरक है। जो हमारे पास है, उसके प्रति दिल में उपजा गहरा आभार ही असली स्वर्ग है।
मृत्यु के बाद क्या होगा, इस रहस्य के फेर में पड़ने से बेहतर है कि इस जीवित धरती पर मिले उपहारों को सहेजा जाए। हवा, पानी, अन्न और अपनों का साथ—यह सब कुछ मिलने के बाद भी यदि हम हमेशा उदास और असंतुष्ट रहें, तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा।
शायद ईश्वर भी ऊपर बैठकर मुस्कुराते हुए यही कहते होंगे—
"मैंने तुम्हें धरती पर ही स्वर्ग दे रखा है, पर तुमने वहाँ भी शिकायतों का एक लंबा दफ्तर खोल लिया है!"
तो आइए, आज से अपनी शिकायतों की फाइलें बंद कीजिए और अपनी कृतज्ञताओं के पन्ने पलटिए। क्योंकि जिस हृदय में शुक्रगुज़ार होने की आदत बसती है, वहाँ अपने आप परमानंद का स्वर्ग उतर आता है।
आइये जो मिला है उसके लिए कृतज्ञ हों..!
🙏 🙏 आभार सभी का 🙏 🙏
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