तीर्थ बनी अदालत

जीत संस्कारों की 

 रामस्वरूप मिश्रा जी के कदम जैसे-जैसे कटघरे की ओर बढ़ रहे थे, पूरे कोर्ट रूम में एक अजीब-सी बेचैनी फैल रही थी। सत्तर साल की उम्र, चेहरे पर झुर्रियों का ताना-बाना और आँखों में छलकती बेबसी। बगल में बैठी उनकी पत्नी सरला देवी ने उनका काँपता हाथ थाम रखा था।

​बाहर गलियारे में खड़े लोग खिड़कियों से झाँककर अंदाज़ा लगाने की कोशिश कर रहे थे। एक वकील ने मुस्कुराते हुए चाय का घूँट लिया और बोला, "फिर वही पुरानी कहानी होगी—बाप की ज़मीन के तीन हिस्से और तीन बेटों की खींचतान।"

​लेकिन जैसे ही जज साहब ने फाइल खोली, माहौल का तापमान बदल गया।

​"तो मिस्टर मिश्रा," जज ने चश्मा उतारकर मेज़ पर रखा, "विवाद क्या है? कागज़ात कहते हैं कि मामला तीनों बेटों और आपके बीच का है।"

​सबसे बड़े बेटे विनय ने आगे बढ़कर हाथ जोड़े। उसकी आवाज़ में कोई ऐंठ नहीं, बस एक अजीब-सी मिन्नत थी, "माई लॉर्ड, मैं चाहता हूँ कि माँ-बाबूजी मेरे साथ रहें। बस इतनी-सी अर्ज़ी है।"

​इससे पहले कि जज कुछ कहते, मंझला बेटा दीपक बीच में ही बोल पड़ा, "नहीं साहब! पिछले दस साल से बड़े भैया ही इनकी सेवा कर रहे हैं। अब उनका हक़ नहीं, मेरा फर्ज़ है। ये मेरे घर चलेंगे।"

​सबसे छोटा मोहित अपनी जगह पर खड़ा नहीं रह सका। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, "दोनों भाई सरासर ज़्यादती कर रहे हैं। मैं सबसे छोटा हूँ, मुझे अपने माँ-बाप का कर्ज़ चुकाने का मौका मिलना चाहिए।"

​पूरे इजलास में सन्नाटा पसर गया। जो लोग तमाशा देखने आए थे, वे अपनी कुर्सियों पर सीधे होकर बैठ गए।

​जज ने हैरान होकर रामस्वरूप जी की तरफ देखा, "अगर तीनों बेटे आपको साथ ले जाना चाहते हैं... तो फिर आप लोग अदालत के दरवाज़े तक क्यों आए?"

​रामस्वरूप जी ने गहरी साँस ली। उनकी काँपती आवाज़ ने सन्नाटे को चीर दिया, "हुज़ूर... यही तो हमारी बदकिस्मती है या शायद सबसे बड़ी खुशकिस्मती! हमने खेत बेचकर इन्हें पढ़ाया, खुद फटे कपड़े पहने पर इनकी पढ़ाई नहीं रुकने दी। अब इस उम्र में हम चाहते थे कि हम किसी एक के पास रहें ताकि बाकी दो अपने-अपने गृहस्थ जीवन पर ध्यान दे सकें। लेकिन ये तीनों मानने को तैयार ही नहीं हैं। ये हमें बाँटना नहीं चाहते, बल्कि एक-दूसरे से छीनना चाहते हैं।"

​जज ने तीनों भाइयों की ओर देखा और विनय से पूछा, "तुम इतनी ज़िद क्यों कर रहे हो?"

​विनय का गला भर आया, "हज़ूर, जब मैं सात साल का था, मुझे पोलिया हो गया था। डॉक्टरों ने कह दिया था कि यह कभी चल नहीं पाएगा। बाबूजी रोज़ मुझे पाँच किलोमीटर गोद में उठाकर अस्पताल ले जाते थे। अगर उस दिन इन्होंने मुझे उठाने से मना कर दिया होता, तो आज मैं अपने पैरों पर खड़ा नहीं होता। आज जब इनके पैर थक गए हैं, तो क्या मैं इन्हें छोड़ दूँ?"

​कटघरे के पास बैठा हर व्यक्ति स्तब्ध था।

​फिर दीपक ने अपनी जेब से एक धुँधला, पुराना रूमाल निकाला, "साहब, यह माँ का रूमाल है। जब मुझे इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला मिला और फीस के पैसे नहीं थे, तब माँ ने अपने शादी के कंगन बेच दिए थे। मुझसे झूठ कहा कि कंगन चोरी हो गए, ताकि मुझे बोझ न लगे। आज मेरी अच्छी-खासी कमाई है, अगर माँ-बाबूजी ही मेरे घर की छत के नीचे न हों, तो मेरी इस कमाई की कीमत क्या है?"

​सबकी निगाहें अब मोहित पर टिक गई थीं।

​मोहित ने रुँधे गले से कहा, "मेरे एक्सीडेंट के वक्त जब मुझे खून की सख्त ज़रूरत थी, बाबूजी का बीपी बहुत लो था। डॉक्टर ने मना किया था कि इस उम्र में खून देना जानलेवा हो सकता है। बाबूजी ने डॉक्टर का हाथ पकड़कर कहा था—'अगर मेरे बेटे की साँस चलती रहे, तो मेरी जान चली जाए तब भी कोई गम नहीं।' हुज़ूर, जिन्होंने मुझे अपनी साँसें दीं, मैं उन्हें किसी और के भरोसे कैसे छोड़ दूँ?"

​अदालत में बैठे कई लोगों के हाथ अपने आँसू पोंछने के लिए जेब की तरफ बढ़ गए थे। जज ने कुछ पल के लिए अपनी आँखें मूँद लीं।

​फिर उन्होंने सरला देवी से पूछा, "माँ जी, कानून तो बाद में बोलेगा... आप बताइए, आप किसके साथ जाना चाहती हैं?"

​सरला देवी के चेहरे पर एक भीगी सी मुस्कान तैर गई, "साहब, एक माँ अपने तीन दिलों में से किस दिल को चुने? तीनों ही तो मेरी आत्मा के टुकड़े हैं।"

​जज ने पेन उठाया, कुछ देर सोचा और फिर भारी आवाज़ में कहा, "आज इस अदालत में कानून कोई फैसला नहीं सुनाएगा, क्योंकि कानून संस्कारों के आगे बहुत छोटा पड़ गया है।"

​उन्होंने तीनों भाइयों को देखते हुए कहा, "यह अदालत कोई हुक्मनामा जारी नहीं करेगी। लेकिन यह आधिकारिक रूप से दर्ज करेगी कि इस शहर में एक ऐसा परिवार भी है जहाँ जायदाद की वसीयत के लिए नहीं, बल्कि माँ-बाप के आशीर्वाद पर हक़ जताने के लिए जंग होती है।"

​फिर जज साहब के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान आई, "फैसला यह है कि रामस्वरूप जी और सरला देवी अपनी मर्ज़ी से जहाँ चाहें रहें... लेकिन हर रविवार, तीनों बेटे, तीनों बहुएँ और सारे नाती-पोते एक ही छत के नीचे बैठकर एक साथ खाना खाएंगे। यह अदालत का आदेश भी है और इस परिवार का नियम भी।"

​अदालत के बाहर जब संवाददाताओं ने तीनों भाइयों को घेरा और पूछा कि यह बात घर पर बैठकर क्यों नहीं सुलझाई गई, तो दीपक ने कहा, "हम चाहते थे कि दुनिया देखे—माँ-बाप कोई ज़िम्मेदारी या बोझ नहीं होते।"

​और मोहित ने आँसू पोंछते हुए बात पूरी की, "जिस घर में माँ-बाप को अपने पास रखने के लिए झगड़ा हो... वो घर दुनिया का सबसे बड़ा तीर्थ बन जाता है।"

​अगले दिन यह खबर शहर के हर अखबार के मुखपृष्ठ पर थी। और कहते हैं, उस एक खबर के छपने के हफ्ते भर के भीतर, स्थानीय वृद्धाश्रमों से कई बुज़ुर्गों को उनके बेटे रोते हुए वापस अपने घर ले गए।

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