धर्माचरण: पहचानें आत्मा का स्वभाव

 

धर्म कोई आचरण का मुखौटा नहीं, आत्मा का स्वभाव है

​प्रायः हम क्रियाकांडों की पुनरावृत्ति को ही धर्म मान बैठते हैं। पूजा, प्रार्थना, उपवास या उपदेशों का श्रवण कर लेना ही धर्म नहीं—ये सभी धर्म के साधन हैं, साध्य नहीं। ये चित्त को स्थिर करने और आत्मा को दिशा देने वाले पाथेय अवश्य हैं, किंतु केवल बाह्य अनुष्ठानों की उपस्थिति भीतर के रूपांतरण की गारंटी नहीं देती।

​धर्म क्रिया की जड़ता में नहीं, चेतना की तरलता और अंतर्भाव की शुद्धि में घटित होता है।

साधना का वास्तविक निकष (कसौटी)

​धार्मिक होना स्वयं को किसी श्रेष्ठ पद पर प्रतिष्ठित करना नहीं, बल्कि अपने भीतर से सूक्ष्म विकारों को विदा करना है।

  • आंतरिक शुद्धि: जहां छल-कपट, पक्षपात, दंभ और ईर्ष्या क्षीण होने लगें; और उनके स्थान पर ऋजुता (सरलता), मार्दव (विनम्रता) एवं करुणा का स्वतः प्रस्फुटन हो—वहीं धर्म अंकुरित होता है।
  • सत्य की निष्पक्षता: सत्य जब तक 'मेरे' और 'तेरे' के चश्मे से देखा जाएगा, तब तक वह केवल स्वार्थ का पोषण करेगा। यदि सत्य हमारे अनुकूल होने पर ही सत्य है, तो वह चित्त का भ्रम है। सच्चा धर्म वहां है, जहां न्याय अपने प्रिय के विरुद्ध और अप्रिय के पक्ष में भी अडिग रहे।

अंतर्मुखी आत्म-परीक्षण: स्वयं का संधान (संबंधन)

​धर्म बाह्य जगत को नियंत्रित करने की विद्या नहीं, अंतर्जगत के अन्वेषण की यात्रा है। प्रतिदिन आत्मा के सम्मुख मौन होकर यह पूछना ही सच्ची सामायिक है:

  • ​क्या मेरी सरलता केवल अनुकूल परिस्थितियों तक सीमित है?
  • ​क्या मैंने अपने स्वार्थ, प्रतिष्ठा या अहंकार के पोषण हेतु सत्य को मौन किया?
  • ​क्या मेरी दृष्टि दूसरों के छिद्र खोजने में व्यग्र है और स्वयं के विकारों के प्रति अंधी?
  • ​क्या मेरे धार्मिक होने के भाव ने मुझमें कोई सूक्ष्म अहंकार तो नहीं भर दिया?

जीवन में धर्म की अभिव्यक्ति

​मंदिर में बिताए गए क्षणों की सार्थकता इस बात से तय होती है कि मंदिर से बाहर निकलने के बाद हमारा आचरण कैसा है। धर्म की कसौटी माला के मनकों की संख्या नहीं, बल्कि यह है कि हमारे संपर्क में आने वाले जीव को हमसे कितना अभय, कितनी प्रामाणिकता और कितना स्नेह मिला।

  • ​धर्म दूसरों को पराजित करने का शस्त्र नहीं, स्वयं को परिष्कृत करने का शास्त्र है।
  • ​धर्म ओढ़ा जाने वाला परिधान नहीं, आत्मा की नैसर्गिक नग्नता और सहजता है।
  • ​धर्म प्रदर्शन की वस्तु नहीं, अंतःकरण की अनुभूति है।

​जब तक साधना दूसरों को बदलने की महत्वाकांक्षा बनी रहेगी, वह केवल बौद्धिक विलास है। जिस क्षण यह समझ आ जाए कि रूपांतरण केवल और केवल 'स्व' का होना है, उसी क्षण बाह्य क्रिया समाप्त होकर वास्तविक अध्यात्म प्रारंभ होता है। यही बंधन और मोक्ष, पाप और धर्म का सनातन भेद है।

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